शुक्ल पक्ष पूर्णिमा • १००% प्रकाशपूर्णिमा
दैनिक पंचांग

दैनिक पंचांग, २६ अक्टूबर २०२६

१५, आश्विनशुक्ल पक्ष, पूर्णिमा
२०८२ गुजराती संवत
२६
अक्टूबर २०२६
सोमवार
पर्व एवं व्रत सूची:आसो पूर्णिमाइष्टिशरद पूर्णिमा / कोजागरीशारदीय नवरात्रि घटस्थापनाGanda Moolaचातुर्मास अवधि∞योग:वज्रसिद्ध योग

पञ्चाङ्ग के पाँच अंग

तिथि

समाप्ति समय ०९:४१ पूर्वाह्न
अगला: प्रतिपदा

नक्षत्र

समाप्ति समय ०५:४१ अपराह्न
अगला: भरणी

योग

समाप्ति समय ०२:१६ अपराह्न
अगला: सिद्धि

करण

समाप्ति समय ०९:४१ पूर्वाह्न
अगला: बालव

वार

सोमवार
वार (चन्द्र)
ग्रह स्वामी: चन्द्र

२४ घंटे का दैनिक प्रवाह (सूर्योदय से सूर्योदय)

स्थानीय सौर दिवस
०६:१६ पूर्वाह्न (सूर्योदय)१२:०००५:४० अपराह्न (सूर्यास्त)००:०००६:१६ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७ (अगला सूर्योदय)
तिथि
पूर्णिमा (०९:४१ पूर्वाह्न)
प्रतिपदा
नक्षत्र
अश्विनी (समाप्ति समय ०५:४१ अपराह्न)
भरणी
योग
वज्र (समाप्ति समय ०२:१६ अपराह्न)
सिद्धि
करण
बव (०९:४१ पूर्वाह्न)
बालव (समाप्ति समय ०८:२४ अपराह्न)
कौलव

सूर्य एवं चन्द्र

सूर्य

सूर्योदय
०६:१६ पूर्वाह्न
सूर्यास्त
०५:४० अपराह्न
सूर्य राशि: तुलादिनमान: ११ घंटे २४ मिनटमध्याह्न (सौर दोपहर): ११:५८ पूर्वाह्न

चन्द्र

चंद्रोदय
०५:३७ अपराह्न
चंद्रास्त
None
चंद्र राशि: मेषरात्रिमान: १२ घंटे ३६ मिनट

विस्तृत पंचांग

शुक्ल पक्ष
तिथि
पूर्णिमासमाप्ति समय ०९:४१ पूर्वाह्न• अगला: प्रतिपदा
वज्रसमाप्ति समय ०२:१६ अपराह्न• अगला: सिद्धि
वार
सोमवार
मास (अमान्त)
आश्विन
अश्विनीसमाप्ति समय ०५:४१ अपराह्न• अगला: भरणी
करण
बव(०९:४१ पूर्वाह्न)बालव(०८:२४ अपराह्न)कौलव(सम्पूर्ण रात्रि)
पक्ष
शुक्ल पक्ष(शुक्ल पक्ष)
मास (पूर्णिमान्त)
आश्विन

राशि एवं नक्षत्र विवरण

सूर्य नक्षत्र: स्वाति (पद १)
चंद्र राशि
मेष(सम्पूर्ण रात्रि तक)→ वृषभ (सम्पूर्ण रात्रि से)
सूर्य राशि
तुला• निरयण प्रणाली
सूर्य नक्षत्र
नक्षत्र पद
अश्विनी (पद २)०६:३४ पूर्वाह्नअश्विनी (पद ३)१२:०८ अपराह्नअश्विनी (पद ४)०५:४१ अपराह्नभरणी (पद १)११:१२ अपराह्नभरणी (पद २)०४:४२ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७भरणी (पद ३)जारी
सूर्य भोगांश: १८८.३९°चन्द्र भोगांश: ६.४८°

चन्द्रमास, संवत् एवं बृहस्पति संवत्सर

वि.सं. २०८३ · शक १९४८
विक्रम संवत्
शक संवत्
१९४८पराभव
गुजराती संवत्
२०८२पिंगल
प्रविष्टे / गते
१०(सौर मास दिवस)
बृहस्पति संवत्
रौद्रतक ०३:४२ pm, मंगलवार, २१ अप्रैल २०२६
आगामी संवत्
दुर्मति(परवर्ती बृहस्पति वर्ष)
चन्द्रमास
आश्विन(पूर्णिमांत)
आश्विन(अमान्त)
संवत्सर चक्र
बार्हस्पत्य ६०-वर्षीय चक्र(उत्तर/दक्षिण परम्परा)

शुभ मुहूर्त

१६ मुहूर्त९ सक्रिय
प्रमुख सौर मुहूर्त (८)८ सक्रिय
  • ब्रह्म मुहूर्त
    ०४:३६ पूर्वाह्न – ०५:२६ पूर्वाह्न
  • प्रातः संध्या
    ०५:०१ पूर्वाह्न – ०६:१६ पूर्वाह्न
  • ११:३६ पूर्वाह्न – १२:२१ अपराह्न
  • विजय मुहूर्त
    ०१:५३ अपराह्न – ०२:३८ अपराह्न
  • गोधूलि मुहूर्त
    ०५:४१ अपराह्न – ०६:०६ अपराह्न
  • सायं संध्या
    ०५:४१ अपराह्न – ०६:५६ अपराह्न
  • अमृत काल
    ०३:२७ अपराह्न – ०४:५६ अपराह्न
  • निशीथ मुहूर्त
    ११:३४ अपराह्न – १२:२४ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
शुभ योग (८)१ सक्रिय
✨

शुभ समय मार्गदर्शिका: नए कार्य आरंभ करने, यात्रा और शुभ अनुष्ठानों के लिए ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित और अमृत काल परंपरागत रूप से चुने जाते हैं।

अशुभ काल

१९ काल७ सक्रिय
प्रतिकूल काल एवं दोष (१०)७ सक्रिय
  • ०७:४२ पूर्वाह्न – ०९:०७ पूर्वाह्न
  • यमगंड
    १०:३३ पूर्वाह्न – ११:५८ पूर्वाह्न
  • गुलिक काल
    ०१:२४ अपराह्न – ०२:५० अपराह्न
  • दुर्मुहूर्त
    १२:२१ अपराह्न – ०१:०७ अपराह्न
  • वर्ज्यम्
    ०२:२८ पूर्वाह्न – ०३:५६ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
  • बाण दोष
    चोर
  • भद्रा (विष्टि)
    कोई नहीं
  • विंचुडो
    कोई नहीं
  • पंचक
    कोई नहीं
  • ०५:४१ अपराह्न – ०६:१६ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
अशुभ योग (९)० सक्रिय
💡

परम्परागत निर्देश: राहुकाल व यमघण्ट में शुभ कार्य, नवीन निवेश एवं यात्रा वर्जित मानी जाती है।

ऋतु एवं अयन

शरद् ऋतु
दृक अयन
दक्षिणायन
दृक ऋतु
शरद् ऋतु
नेत्रम्
२ (दो नेत्र - अत्यंत शुभ)
वैदिक अयन
दक्षिणायन
वैदिक ऋतु
शरद् ऋतु
जीव
१ (पूर्ण जीव - अति शुभ)

निवास, शूल एवं वास

पंचक रहित: शुभ
चन्द्र निवास
पूर्व(सम्पूर्ण रात्रि तक)→दक्षिण
अग्निवास
पृथ्वी (अत्यंत शुभ)(समाप्ति समय ०९:४१ पूर्वाह्न)→आकाश (अशुभ)
दिशा शूल
पूर्व(घी खाकर यात्रा करें)
शिववास
श्मशान(समाप्ति समय ०९:४१ पूर्वाह्न)→गौरी (गौरी के साथ)
राहु वास
उत्तर-पश्चिम (वायव्य)
होमाहुति
चन्द्र
कुम्भ चक्र
दक्षिण
पंचक रहित
शुभ

मन्त्री मण्डल (ग्रह परिषद)

राजा
गुरू
मन्त्री
मंगल
सेनापति
चन्द्र
सस्याधिपति (ग्रीष्म धान्य)
गुरू
धान्याधिपति (शीत धान्य)
बुध
धनाधिपति (वित्त एवं खजाना)
गुरू
मेघाधिपति (वर्षा एवं बादल)
चन्द्र
रसाधिपति (रस एवं तरल पदार्थ)
शनि
नीरसाधिपति (धातु एवं रत्न)
गुरू
फलाधिपति
चन्द्र

चंद्रबलम्

६ शुभ / अनुकूल१ अष्टम चन्द्र (सावधानी आवश्यक)
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
शुभ / अनुकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
अष्टम चन्द्र (सावधानी आवश्यक)
शुभ / अनुकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
प्रतिकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल

ताराबलम्

१५ शुभ / अनुकूल१२ प्रतिकूल
जन्मप्रतिकूल
परम मित्र (अति शुभ)शुभ / अनुकूल
मित्र (हितैषी)शुभ / अनुकूल
निधन (हानि)प्रतिकूल
साधना (सिद्धि)शुभ / अनुकूल
प्रत्यक् (बाधा)प्रतिकूल
क्षेम (कल्याण)शुभ / अनुकूल
विपत् (विपत्ति)प्रतिकूल
सम्पत् (धन-वैभव)शुभ / अनुकूल
जन्मप्रतिकूल

पंचक रहित मुहूर्त चक्र

९ शुभ४ अशुभ
०६:१६ पूर्वाह्न – ०७:५६ पूर्वाह्न
शुभ पंचक
०७:५६ पूर्वाह्न – १०:१२ पूर्वाह्न
शुभ पंचक
१०:१२ पूर्वाह्न – १२:१७ अपराह्न
मृत्यु पंचक (अत्यंत अशुभ)
१२:१७ अपराह्न – ०२:०४ अपराह्न
अग्नि पंचक (अग्नि भय)
०२:०४ अपराह्न – ०३:३८ अपराह्न
शुभ पंचक
०३:३८ अपराह्न – ०५:०९ अपराह्न
राज पंचक (राज्य लाभ)
०५:०९ अपराह्न – ०६:४९ अपराह्न
शुभ पंचक
०६:४९ अपराह्न – ०८:४८ अपराह्न
राज पंचक (राज्य लाभ)
०८:४८ अपराह्न – ११:०१ अपराह्न
शुभ पंचक
११:०१ अपराह्न – ०१:१७ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
शुभ पंचक
०१:१७ पूर्वाह्न – ०३:२८ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
रोग पंचक (स्वास्थ्य कष्ट)
०३:२८ पूर्वाह्न – ०५:३८ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
शुभ पंचक
०५:३८ पूर्वाह्न – ०६:१६ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
मृत्यु पंचक (अत्यंत अशुभ)
—
—

उदय लग्न समय

12 राशियां
०६:१६ पूर्वाह्न – ०७:५६ पूर्वाह्न
०७:५६ पूर्वाह्न – १०:१२ पूर्वाह्न
१०:१२ पूर्वाह्न – १२:१७ अपराह्न
१२:१७ अपराह्न – ०२:०४ अपराह्न
०२:०४ अपराह्न – ०३:३८ अपराह्न
०३:३८ अपराह्न – ०५:०९ अपराह्न
०५:०९ अपराह्न – ०६:४९ अपराह्न
०६:४९ अपराह्न – ०८:४८ अपराह्न
०८:४८ अपराह्न – ११:०१ अपराह्न
११:०१ अपराह्न – ०१:१७ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
०१:१७ पूर्वाह्न – ०३:२८ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
०३:२८ पूर्वाह्न – ०५:३८ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
०५:३८ पूर्वाह्न – ०६:१६ पूर्वाह्न, अक्टूबर २७
—
—

अन्य कैलेंडर एवं युग गणना

3 क्षेत्र • 9 मान
वैदिक कालक्रम
कलियुग वर्ष
५१२७
कलि अहर्गण
१८७२८७४
लाहिरी अयनांश
२४.२३०८४६°
खगोलीय गणना
जूलियन दिन
२४६१३३९
संशोधित जूलियन दिन
६१३३९
राता डाई (RD)
७३९९१५
राष्ट्रीय एवं जूलियन तिथियाँ
राष्ट्रीय दिनांक
४ कार्तिक, १९४८
निरयण दिनांक
१० भाद्रपद, १९४८
जूलियन दिनांक
१३ अक्टूबर, २०२६ ई.

पर्व, व्रत एवं अनुष्ठान

६ दैनिक व्रत एवं पर्व

आसो पूर्णिमा

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला आसो पूर्णिमा का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

आसो पूर्णिमा का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

इष्टि

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला इष्टि का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

इष्टि का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

शरद पूर्णिमा / कोजागरी

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला शरद पूर्णिमा / कोजागरी का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

शरद पूर्णिमा / कोजागरी का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

शारदीय नवरात्रि घटस्थापना

प्रमुख पर्व

साहस, विजय, पारिवारिक कल्याण और माँ जगदम्बा की असीम कृपा प्राप्ति हेतु समर्पित शारदीय नवरात्रि घटस्थापना का पावन शक्ति व्रत।

पूज्य देवता
माँ भगवती आद्यशक्ति दुर्गा (जगदम्बा / भवानी)
धार्मिक महत्व

शारदीय नवरात्रि घटस्थापना का आध्यात्मिक महत्व: १. संकट नाश: भय, रोग और दुष्ट शक्तियों का दमन होता है। २. शक्ति एवं सामर्थ्य: आत्मविश्वास, ओज और तेज की वृद्धि होती है। ३. सुख-समृद्धि: परिवार में सुख, आरोग्य और शांति का विस्तार होता है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातः स्नान कर लाल वस्त्र धारण करें और माँ दुर्गा के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦माँ को रोली, अक्षत, सिन्दूर, लाल अड़हुल (गुड़हल) के फूल और लाल चुनरी अर्पित करें।
  • ✦दुर्गा सप्तशती, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
  • ✦हलवा, पूरी, चना, मखाने की खीर और ऋतुफल का भोग लगाएं।
  • ✦संध्या समय कपूर से माँ दुर्गा की भव्य आरती करें।
  • ✦सात्विक प्रसाद ग्रहण कर व्रत संपन्न करें।

Ganda Moola

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला Ganda Moola का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

Ganda Moola का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

चातुर्मास अवधि

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला चातुर्मास अवधि का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

चातुर्मास अवधि का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

पञ्चाङ्ग के पाँच अंग एवं दैनिक पञ्चाङ्ग

5 अंग
पञ्चाङ्ग वैदिक काल-गणना की प्राचीन प्रणाली है, जो सूर्य एवं चन्द्रमा की गति पर आधारित सूक्ष्म खगोलीय सिद्धांतों को प्रस्तुत करती है। 'दैनिक' का अर्थ प्रतिदिन का पञ्चाङ्ग है।

तिथि

1

सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२° के कोणीय अंतर को तिथि कहते हैं। यह व्रत, पर्व और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्धारण का मुख्य आधार है।

नक्षत्र

2

चन्द्रमा जिस २७ नक्षत्र मंडलों (१३° २०' प्रत्येक) में भ्रमण करता है, वह नक्षत्र कहलाता है। यह मानसिक प्रकृति और दैनिक ऊर्जा को प्रभावित करता है।

योग

3

सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग २७ भागों में विभाजित होता है, जिसे योग कहते हैं। यह दिन के वातावरण और अंतःकरण की शुद्धि का सूचक है।

करण

4

एक तिथि के आधे भाग (६°) को करण कहते हैं। यह विशिष्ट कार्यों और मुहूर्तों के सूक्ष्म चयन हेतु उपयोगी है।

वार

5

सात ग्रहों के आधिपत्य वाला वार (दिन), जो स्थानीय सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के २४ घंटों के चक्र को नियंत्रित करता है।