शुक्ल पक्ष तृतीया • ९% प्रकाशशुक्ल पक्ष (बालचन्द्र)
दैनिक पंचांग

दैनिक पंचांग, १४ सितंबर २०२६

३, भाद्रपदशुक्ल पक्ष, तृतीया
२०८२ गुजराती संवत
१४
सितंबर २०२६
सोमवार
पर्व एवं व्रत सूची:हरतालिका त्रीजगौरी पर्वविनायक चतुर्थीगणेश चतुर्थीसिद्धिविनायक चतुर्थीविनायक चतुर्थीRavi YogaVidaal Yoga2nd Chaturmasa Day 22∞योग:ब्रह्म✦रवि योगPrabalarishta

पञ्चाङ्ग के पाँच अंग

तिथि

समाप्ति समय ०७:०७ पूर्वाह्न
अगला: चतुर्थी

नक्षत्र

समाप्ति समय ०१:५४ अपराह्न
अगला: स्वाति

योग

समाप्ति समय १२:४६ अपराह्न
अगला: इन्द्र

करण

समाप्ति समय ०७:०७ पूर्वाह्न
अगला: वणिज

वार

सोमवार
वार (चन्द्र)
ग्रह स्वामी: चन्द्र

२४ घंटे का दैनिक प्रवाह (सूर्योदय से सूर्योदय)

स्थानीय सौर दिवस
०६:०१ पूर्वाह्न (सूर्योदय)१२:०००६:१८ अपराह्न (सूर्यास्त)००:०००६:०१ पूर्वाह्न, सितम्बर १५ (अगला सूर्योदय)
तिथि
तृतीया
चतुर्थी
नक्षत्र
चित्रा (समाप्ति समय ०१:५४ अपराह्न)
स्वाति
योग
ब्रह्म (समाप्ति समय १२:४६ अपराह्न)
इन्द्र
करण
गरज
वणिज (समाप्ति समय ०७:२१ अपराह्न)
विष्टि (भद्रा)

सूर्य एवं चन्द्र

सूर्य

सूर्योदय
०६:०१ पूर्वाह्न
सूर्यास्त
०६:१८ अपराह्न
सूर्य राशि: सिंहदिनमान: १२ घंटे १७ मिनटमध्याह्न (सौर दोपहर): १२:१० अपराह्न

चन्द्र

चंद्रोदय
०८:४५ पूर्वाह्न
चंद्रास्त
०८:१० अपराह्न
चंद्र राशि: तुलारात्रिमान: ११ घंटे ४३ मिनट

विस्तृत पंचांग

शुक्ल पक्ष
तिथि
तृतीयासमाप्ति समय ०७:०७ पूर्वाह्न• अगला: चतुर्थी
ब्रह्मसमाप्ति समय १२:४६ अपराह्न• अगला: इन्द्र
वार
सोमवार
मास (अमान्त)
भाद्रपद
चित्रासमाप्ति समय ०१:५४ अपराह्न• अगला: स्वाति
करण
गरज(०७:०७ पूर्वाह्न)वणिज(०७:२१ अपराह्न)विष्टि (भद्रा)(सम्पूर्ण रात्रि)
पक्ष
शुक्ल पक्ष(शुक्ल पक्ष)
मास (पूर्णिमान्त)
भाद्रपद

राशि एवं नक्षत्र विवरण

सूर्य नक्षत्र: उत्तराफाल्गुनी (पद १)
चंद्र राशि
तुला(सम्पूर्ण रात्रि तक)→ वृश्चिक (सम्पूर्ण रात्रि से)
सूर्य राशि
सिंह• निरयण प्रणाली
सूर्य नक्षत्र
नक्षत्र पद
चित्रा (पद ३)०७:३९ पूर्वाह्नचित्रा (पद ४)०१:५४ अपराह्नस्वाति (पद १)०८:१२ अपराह्नस्वाति (पद २)०२:३३ पूर्वाह्न, सितम्बर १५स्वाति (पद ३)जारी
सूर्य भोगांश: १४७°चन्द्र भोगांश: १८२.४६°

चन्द्रमास, संवत् एवं बृहस्पति संवत्सर

वि.सं. २०८३ · शक १९४८
विक्रम संवत्
शक संवत्
१९४८पराभव
गुजराती संवत्
२०८२पिंगल
प्रविष्टे / गते
२९(सौर मास दिवस)
बृहस्पति संवत्
रौद्रतक ०३:४२ pm, मंगलवार, २१ अप्रैल २०२६
आगामी संवत्
दुर्मति(परवर्ती बृहस्पति वर्ष)
चन्द्रमास
भाद्रपद(पूर्णिमांत)
भाद्रपद(अमान्त)
संवत्सर चक्र
बार्हस्पत्य ६०-वर्षीय चक्र(उत्तर/दक्षिण परम्परा)

शुभ मुहूर्त

१६ मुहूर्त१० सक्रिय
प्रमुख सौर मुहूर्त (८)८ सक्रिय
  • ब्रह्म मुहूर्त
    ०४:२८ पूर्वाह्न – ०५:१५ पूर्वाह्न
  • प्रातः संध्या
    ०४:५१ पूर्वाह्न – ०६:०१ पूर्वाह्न
  • ११:४६ पूर्वाह्न – १२:३५ अपराह्न
  • विजय मुहूर्त
    ०२:१३ अपराह्न – ०३:०२ अपराह्न
  • गोधूलि मुहूर्त
    ०६:१९ अपराह्न – ०६:४२ अपराह्न
  • सायं संध्या
    ०६:१९ अपराह्न – ०७:२९ अपराह्न
  • अमृत काल
    ०४:१९ पूर्वाह्न – ०६:०१ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
  • निशीथ मुहूर्त
    ११:४७ अपराह्न – १२:३४ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
शुभ योग (८)२ सक्रिय
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शुभ समय मार्गदर्शिका: नए कार्य आरंभ करने, यात्रा और शुभ अनुष्ठानों के लिए ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित और अमृत काल परंपरागत रूप से चुने जाते हैं।

अशुभ काल

१९ काल८ सक्रिय
प्रतिकूल काल एवं दोष (१०)७ सक्रिय
  • ०७:३४ पूर्वाह्न – ०९:०६ पूर्वाह्न
  • यमगंड
    १०:३८ पूर्वाह्न – १२:१० अपराह्न
  • गुलिक काल
    ०१:४२ अपराह्न – ०३:१४ अपराह्न
  • दुर्मुहूर्त
    १२:३५ अपराह्न – ०१:२४ अपराह्न
  • वर्ज्यम्
    ०७:५० अपराह्न – ०९:३२ अपराह्न
  • बाण दोष
    रोग
  • भद्रा (विष्टि)
    ०७:२१ अपराह्न – ०६:०१ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
  • विंचुडो
    कोई नहीं
  • पंचक
    कोई नहीं
  • कोई नहीं
अशुभ योग (९)१ सक्रिय
💡

परम्परागत निर्देश: राहुकाल व यमघण्ट में शुभ कार्य, नवीन निवेश एवं यात्रा वर्जित मानी जाती है।

ऋतु एवं अयन

वर्षा ऋतु
दृक अयन
दक्षिणायन
दृक ऋतु
वर्षा ऋतु
नेत्रम्
० (नेत्रहीन - अशुभ/वर्ज्य)
वैदिक अयन
दक्षिणायन
वैदिक ऋतु
वर्षा ऋतु
जीव
०.५ (अर्ध जीव - मध्यम फल)

निवास, शूल एवं वास

पंचक रहित: शुभ
चन्द्र निवास
पश्चिम(सम्पूर्ण रात्रि तक)→उत्तर
अग्निवास
पृथ्वी (अत्यंत शुभ)(समाप्ति समय ०७:०७ पूर्वाह्न)→आकाश (अशुभ)
दिशा शूल
पूर्व(घी खाकर यात्रा करें)
शिववास
सभा (शुभ फलदायी)(समाप्ति समय ०७:०७ पूर्वाह्न)→क्रीड़ा (खेलते हुए)
राहु वास
उत्तर-पश्चिम (वायव्य)
होमाहुति
सूर्य
कुम्भ चक्र
दक्षिण
पंचक रहित
शुभ

मन्त्री मण्डल (ग्रह परिषद)

राजा
गुरू
मन्त्री
मंगल
सेनापति
चन्द्र
सस्याधिपति (ग्रीष्म धान्य)
गुरू
धान्याधिपति (शीत धान्य)
बुध
धनाधिपति (वित्त एवं खजाना)
गुरू
मेघाधिपति (वर्षा एवं बादल)
चन्द्र
रसाधिपति (रस एवं तरल पदार्थ)
शनि
नीरसाधिपति (धातु एवं रत्न)
गुरू
फलाधिपति
चन्द्र

चंद्रबलम्

६ शुभ / अनुकूल१ अष्टम चन्द्र (सावधानी आवश्यक)
शुभ / अनुकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
प्रतिकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
शुभ / अनुकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
अष्टम चन्द्र (सावधानी आवश्यक)

ताराबलम्

१५ शुभ / अनुकूल१२ प्रतिकूल
प्रत्यक् (बाधा)प्रतिकूल
क्षेम (कल्याण)शुभ / अनुकूल
विपत् (विपत्ति)प्रतिकूल
सम्पत् (धन-वैभव)शुभ / अनुकूल
जन्मप्रतिकूल
परम मित्र (अति शुभ)शुभ / अनुकूल
मित्र (हितैषी)शुभ / अनुकूल
निधन (हानि)प्रतिकूल
साधना (सिद्धि)शुभ / अनुकूल
प्रत्यक् (बाधा)प्रतिकूल

पंचक रहित मुहूर्त चक्र

८ शुभ५ अशुभ
०६:०१ पूर्वाह्न – ०६:१७ पूर्वाह्न
चोर पंचक (हानि भय)
०६:१७ पूर्वाह्न – ०८:२७ पूर्वाह्न
रोग पंचक (स्वास्थ्य कष्ट)
०८:२७ पूर्वाह्न – १०:४१ पूर्वाह्न
शुभ पंचक
१०:४१ पूर्वाह्न – १२:५७ अपराह्न
अग्नि पंचक (अग्नि भय)
१२:५७ अपराह्न – ०३:०२ अपराह्न
शुभ पंचक
०३:०२ अपराह्न – ०४:४९ अपराह्न
राज पंचक (राज्य लाभ)
०४:४९ अपराह्न – ०६:२३ अपराह्न
शुभ पंचक
०६:२३ अपराह्न – ०७:५४ अपराह्न
चोर पंचक (हानि भय)
०७:५४ अपराह्न – ०९:३४ अपराह्न
राज पंचक (राज्य लाभ)
०९:३४ अपराह्न – ११:३३ अपराह्न
शुभ पंचक
११:३३ अपराह्न – ०१:४६ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
शुभ पंचक
०१:४६ पूर्वाह्न – ०४:०२ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
रोग पंचक (स्वास्थ्य कष्ट)
०४:०२ पूर्वाह्न – ०६:०१ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
शुभ पंचक
—
—

उदय लग्न समय

12 राशियां
०६:०१ पूर्वाह्न – ०६:१७ पूर्वाह्न
०६:१७ पूर्वाह्न – ०८:२७ पूर्वाह्न
०८:२७ पूर्वाह्न – १०:४१ पूर्वाह्न
१०:४१ पूर्वाह्न – १२:५७ अपराह्न
१२:५७ अपराह्न – ०३:०२ अपराह्न
०३:०२ अपराह्न – ०४:४९ अपराह्न
०४:४९ अपराह्न – ०६:२३ अपराह्न
०६:२३ अपराह्न – ०७:५४ अपराह्न
०७:५४ अपराह्न – ०९:३४ अपराह्न
०९:३४ अपराह्न – ११:३३ अपराह्न
११:३३ अपराह्न – ०१:४६ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
०१:४६ पूर्वाह्न – ०४:०२ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
०४:०२ पूर्वाह्न – ०६:०१ पूर्वाह्न, सितम्बर १५
—
—

अन्य कैलेंडर एवं युग गणना

3 क्षेत्र • 9 मान
वैदिक कालक्रम
कलियुग वर्ष
५१२७
कलि अहर्गण
१८७२८३२
लाहिरी अयनांश
२४.२२९२४१°
खगोलीय गणना
जूलियन दिन
२४६१२९७
संशोधित जूलियन दिन
६१२९७
राता डाई (RD)
७३९८७३
राष्ट्रीय एवं जूलियन तिथियाँ
राष्ट्रीय दिनांक
२३ भाद्रपद, १९४८
निरयण दिनांक
१० भाद्रपद, १९४८
जूलियन दिनांक
१ सितंबर, २०२६ ई.

पर्व, व्रत एवं अनुष्ठान

९ दैनिक व्रत एवं पर्व

हरतालिका त्रीज

प्रमुख पर्व

साहस, विजय, पारिवारिक कल्याण और माँ जगदम्बा की असीम कृपा प्राप्ति हेतु समर्पित हरतालिका त्रीज का पावन शक्ति व्रत।

पूज्य देवता
माँ भगवती आद्यशक्ति दुर्गा (जगदम्बा / भवानी)
धार्मिक महत्व

हरतालिका त्रीज का आध्यात्मिक महत्व: १. संकट नाश: भय, रोग और दुष्ट शक्तियों का दमन होता है। २. शक्ति एवं सामर्थ्य: आत्मविश्वास, ओज और तेज की वृद्धि होती है। ३. सुख-समृद्धि: परिवार में सुख, आरोग्य और शांति का विस्तार होता है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातः स्नान कर लाल वस्त्र धारण करें और माँ दुर्गा के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦माँ को रोली, अक्षत, सिन्दूर, लाल अड़हुल (गुड़हल) के फूल और लाल चुनरी अर्पित करें।
  • ✦दुर्गा सप्तशती, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
  • ✦हलवा, पूरी, चना, मखाने की खीर और ऋतुफल का भोग लगाएं।
  • ✦संध्या समय कपूर से माँ दुर्गा की भव्य आरती करें।
  • ✦सात्विक प्रसाद ग्रहण कर व्रत संपन्न करें।

गौरी पर्व

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला गौरी पर्व का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

गौरी पर्व का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

विनायक चतुर्थी

प्रमुख पर्व

विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का पावन जन्मोत्सव एवं १० दिवसीय गणेशोत्सव का शुभारंभ।

पूज्य देवता
भगवान श्री गणेश
धार्मिक महत्व

समस्त विघ्नों का नाश, बुद्धि, ज्ञान, ऋद्धि-सिद्धि एवं शुभता की प्राप्ति।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦वैदिक मंत्रोच्चार के साथ गणपति बप्पा की प्राण-प्रतिष्ठा
  • ✦२१ मोदक, दूर्वा एवं लाल अड़हुल (गुड़हल) का पुष्प अर्पण
  • ✦प्रातः व सायं आरती एवं अथर्वशीर्ष का पाठ
  • ✦अनंत चतुर्दशी के दिन गाजे-बाजे के साथ विसर्जन

गणेश चतुर्थी

प्रमुख पर्व

विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का पावन जन्मोत्सव एवं १० दिवसीय गणेशोत्सव का शुभारंभ।

पूज्य देवता
भगवान श्री गणेश
धार्मिक महत्व

समस्त विघ्नों का नाश, बुद्धि, ज्ञान, ऋद्धि-सिद्धि एवं शुभता की प्राप्ति।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦वैदिक मंत्रोच्चार के साथ गणपति बप्पा की प्राण-प्रतिष्ठा
  • ✦२१ मोदक, दूर्वा एवं लाल अड़हुल (गुड़हल) का पुष्प अर्पण
  • ✦प्रातः व सायं आरती एवं अथर्वशीर्ष का पाठ
  • ✦अनंत चतुर्दशी के दिन गाजे-बाजे के साथ विसर्जन

सिद्धिविनायक चतुर्थी

प्रमुख पर्व

समस्त विघ्न-बाधाओं के निवारण, बुद्धि, ऋद्धि-सिद्धि और मनोकामना पूर्ति हेतु भगवान श्री गणेश को समर्पित सिद्धिविनायक चतुर्थी का पावन व्रत।

पूज्य देवता
भगवान श्री गणेश (विघ्नहर्ता / एकदंत)
धार्मिक महत्व

सिद्धिविनायक चतुर्थी का आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व: १. विघ्न-निवारण: जीवन के समस्त संकटों, विघ्नों और नकारात्मक प्रभावों का समूल नाश होता है। २. बुद्धि एवं ऋद्धि-सिद्धि: भगवान गणेश की कृपा से ज्ञान, विवेक, व्यापार में उन्नति और सफलता प्राप्त होती है। ३. सुख-समृद्धि: परिवार में परस्पर सौहार्द, आरोग्य और शांति का स्थायी वास होता है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें एवं व्रत का संकल्प लें।
  • ✦पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र कर तांबे या पीतल की चौकी पर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
  • ✦भगवान गणेश को लाल सिंदूर, अक्षत, सुगंधित चंदन और २१ दूर्वा दल समर्पित करें।
  • ✦श्री गणेश चालीसा, अथर्वशीर्ष और संकटनाशन गणेश स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करें।
  • ✦मोदक, बेसन के लड्डू, ऋतु फल एवं नारियल का भोग लगाएं।
  • ✦संध्याकाल/चंद्र दर्शन के पश्चात गणेश जी की आरती कर सात्विक प्रसाद से पारण करें।

विनायक चतुर्थी

प्रमुख पर्व

समस्त विघ्न-बाधाओं के निवारण, बुद्धि, ऋद्धि-सिद्धि और मनोकामना पूर्ति हेतु भगवान श्री गणेश को समर्पित विनायक चतुर्थी का पावन व्रत।

पूज्य देवता
भगवान श्री गणेश (विघ्नहर्ता / एकदंत)
धार्मिक महत्व

विनायक चतुर्थी का आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व: १. विघ्न-निवारण: जीवन के समस्त संकटों, विघ्नों और नकारात्मक प्रभावों का समूल नाश होता है। २. बुद्धि एवं ऋद्धि-सिद्धि: भगवान गणेश की कृपा से ज्ञान, विवेक, व्यापार में उन्नति और सफलता प्राप्त होती है। ३. सुख-समृद्धि: परिवार में परस्पर सौहार्द, आरोग्य और शांति का स्थायी वास होता है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें एवं व्रत का संकल्प लें।
  • ✦पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र कर तांबे या पीतल की चौकी पर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
  • ✦भगवान गणेश को लाल सिंदूर, अक्षत, सुगंधित चंदन और २१ दूर्वा दल समर्पित करें।
  • ✦श्री गणेश चालीसा, अथर्वशीर्ष और संकटनाशन गणेश स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करें।
  • ✦मोदक, बेसन के लड्डू, ऋतु फल एवं नारियल का भोग लगाएं।
  • ✦संध्याकाल/चंद्र दर्शन के पश्चात गणेश जी की आरती कर सात्विक प्रसाद से पारण करें।

रवि योग

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला Ravi Yoga का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

Ravi Yoga का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

Vidaal योग

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला Vidaal Yoga का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

Vidaal Yoga का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

2nd Chaturmasa दिवस 22

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला 2nd Chaturmasa Day 22 का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

2nd Chaturmasa Day 22 का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

पञ्चाङ्ग के पाँच अंग एवं दैनिक पञ्चाङ्ग

5 अंग
पञ्चाङ्ग वैदिक काल-गणना की प्राचीन प्रणाली है, जो सूर्य एवं चन्द्रमा की गति पर आधारित सूक्ष्म खगोलीय सिद्धांतों को प्रस्तुत करती है। 'दैनिक' का अर्थ प्रतिदिन का पञ्चाङ्ग है।

तिथि

1

सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२° के कोणीय अंतर को तिथि कहते हैं। यह व्रत, पर्व और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्धारण का मुख्य आधार है।

नक्षत्र

2

चन्द्रमा जिस २७ नक्षत्र मंडलों (१३° २०' प्रत्येक) में भ्रमण करता है, वह नक्षत्र कहलाता है। यह मानसिक प्रकृति और दैनिक ऊर्जा को प्रभावित करता है।

योग

3

सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग २७ भागों में विभाजित होता है, जिसे योग कहते हैं। यह दिन के वातावरण और अंतःकरण की शुद्धि का सूचक है।

करण

4

एक तिथि के आधे भाग (६°) को करण कहते हैं। यह विशिष्ट कार्यों और मुहूर्तों के सूक्ष्म चयन हेतु उपयोगी है।

वार

5

सात ग्रहों के आधिपत्य वाला वार (दिन), जो स्थानीय सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के २४ घंटों के चक्र को नियंत्रित करता है।