पञ्चाङ्ग के पाँच अंग
२४ घंटे का दैनिक प्रवाह (सूर्योदय से सूर्योदय)
स्थानीय सौर दिवससूर्य एवं चन्द्र
सूर्य
चन्द्र
विस्तृत पंचांग
राशि एवं नक्षत्र विवरण
चन्द्रमास, संवत् एवं बृहस्पति संवत्सर
शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त०४:२७ पूर्वाह्न – ०५:१४ पूर्वाह्न
- प्रातः संध्या०४:५१ पूर्वाह्न – ०६:०० पूर्वाह्न
- ११:४७ पूर्वाह्न – १२:३६ अपराह्न
- विजय मुहूर्त०२:१५ अपराह्न – ०३:०५ अपराह्न
- गोधूलि मुहूर्त०६:२३ अपराह्न – ०६:४६ अपराह्न
- सायं संध्या०६:२३ अपराह्न – ०७:३३ अपराह्न
- अमृत काल०६:२७ पूर्वाह्न – ०७:५८ पूर्वाह्न
- निशीथ मुहूर्त११:४८ अपराह्न – १२:३५ पूर्वाह्न, सितम्बर ११
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- ०२:०४ अपराह्न – ०६:०० पूर्वाह्न, सितम्बर ११
- ०६:०० पूर्वाह्न – ०२:०४ अपराह्न
शुभ समय मार्गदर्शिका: नए कार्य आरंभ करने, यात्रा और शुभ अनुष्ठानों के लिए ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित और अमृत काल परंपरागत रूप से चुने जाते हैं।
अशुभ काल
- ०१:४४ अपराह्न – ०३:१७ अपराह्न
- यमगंड०६:०० पूर्वाह्न – ०७:३३ पूर्वाह्न
- गुलिक काल०९:०६ पूर्वाह्न – १०:३९ पूर्वाह्न
- दुर्मुहूर्त१०:०८ पूर्वाह्न – १०:५७ पूर्वाह्न
- वर्ज्यम्०९:४८ अपराह्न – ११:२० अपराह्न
- बाण दोषमृत्यु
- भद्रा (विष्टि)कोई नहीं
- विंचुडोकोई नहीं
- पंचककोई नहीं
- ०६:०० पूर्वाह्न – ०२:०४ अपराह्न
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
परम्परागत निर्देश: राहुकाल व यमघण्ट में शुभ कार्य, नवीन निवेश एवं यात्रा वर्जित मानी जाती है।
ऋतु एवं अयन
निवास, शूल एवं वास
मन्त्री मण्डल (ग्रह परिषद)
चंद्रबलम्
ताराबलम्
पंचक रहित मुहूर्त चक्र
उदय लग्न समय
अन्य कैलेंडर एवं युग गणना
पर्व, व्रत एवं अनुष्ठान
श्रावण पूर्णिमा
प्रमुख पर्वश्रावण पूर्णिमा पर भाई-बहन के असीम स्नेह, पवित्र प्रेम और रक्षा के पावन संकल्प का महापर्व।
यह पर्व धर्म, मर्यादा और कर्तव्य की रक्षा का संदेश देता है। भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी के चीरहरण के समय रक्षा का वचन निभाया था।
- ✦प्रातः स्नान कर देव पूजन एवं कुलदेवता का स्मरण।
- ✦भद्रा काल का पूर्ण त्याग कर शुभ मुहूर्त में रक्षासूत्र बंधन।
- ✦अपराह्न काल या प्रदोष काल में शुभ चौघड़िया में राखी बांधना।
- ✦आरती उतारकर भाई के मस्तक पर अक्षत-रोली का तिलक लगाना।
- ✦रक्षासूत्र बांधकर मिठाई खिलाना एवं भाई द्वारा उपहार देना।
इष्टि
प्रमुख पर्ववैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला इष्टि का पावन पर्व।
इष्टि का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।
- ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
- ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
- ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।
रक्षाबंधन
प्रमुख पर्वश्रावण पूर्णिमा पर भाई-बहन के असीम स्नेह, पवित्र प्रेम और रक्षा के पावन संकल्प का महापर्व।
यह पर्व धर्म, मर्यादा और कर्तव्य की रक्षा का संदेश देता है। भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी के चीरहरण के समय रक्षा का वचन निभाया था।
- ✦प्रातः स्नान कर देव पूजन एवं कुलदेवता का स्मरण।
- ✦भद्रा काल का पूर्ण त्याग कर शुभ मुहूर्त में रक्षासूत्र बंधन।
- ✦अपराह्न काल या प्रदोष काल में शुभ चौघड़िया में राखी बांधना।
- ✦आरती उतारकर भाई के मस्तक पर अक्षत-रोली का तिलक लगाना।
- ✦रक्षासूत्र बांधकर मिठाई खिलाना एवं भाई द्वारा उपहार देना।
Ganda Moola
प्रमुख पर्ववैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला Ganda Moola का पावन पर्व।
Ganda Moola का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।
- ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
- ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
- ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।
चातुर्मास अवधि
प्रमुख पर्ववैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला चातुर्मास अवधि का पावन पर्व।
चातुर्मास अवधि का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।
- ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
- ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
- ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।
पञ्चाङ्ग के पाँच अंग एवं दैनिक पञ्चाङ्ग
तिथि
1सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२° के कोणीय अंतर को तिथि कहते हैं। यह व्रत, पर्व और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्धारण का मुख्य आधार है।
नक्षत्र
2चन्द्रमा जिस २७ नक्षत्र मंडलों (१३° २०' प्रत्येक) में भ्रमण करता है, वह नक्षत्र कहलाता है। यह मानसिक प्रकृति और दैनिक ऊर्जा को प्रभावित करता है।
योग
3सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग २७ भागों में विभाजित होता है, जिसे योग कहते हैं। यह दिन के वातावरण और अंतःकरण की शुद्धि का सूचक है।
करण
4एक तिथि के आधे भाग (६°) को करण कहते हैं। यह विशिष्ट कार्यों और मुहूर्तों के सूक्ष्म चयन हेतु उपयोगी है।
वार
5सात ग्रहों के आधिपत्य वाला वार (दिन), जो स्थानीय सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के २४ घंटों के चक्र को नियंत्रित करता है।