पञ्चाङ्ग के पाँच अंग
२४ घंटे का दैनिक प्रवाह (सूर्योदय से सूर्योदय)
स्थानीय सौर दिवससूर्य एवं चन्द्र
सूर्य
चन्द्र
विस्तृत पंचांग
चन्द्रमास, संवत् एवं बृहस्पति संवत्सर
शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त०४:११ पूर्वाह्न – ०४:५३ पूर्वाह्न
- प्रातः संध्या०४:३२ पूर्वाह्न – ०५:३५ पूर्वाह्न
- ११:५२ पूर्वाह्न – १२:४६ अपराह्न
- विजय मुहूर्त०२:३४ अपराह्न – ०३:२८ अपराह्न
- गोधूलि मुहूर्त०७:०३ अपराह्न – ०७:२४ अपराह्न
- सायं संध्या०७:०३ अपराह्न – ०८:०६ अपराह्न
- अमृत काल०५:०४ पूर्वाह्न – ०६:४८ पूर्वाह्न
- निशीथ मुहूर्त११:५८ अपराह्न – १२:४० पूर्वाह्न, जुलाई ५
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- ०१:४३ अपराह्न – ०५:३५ पूर्वाह्न, जुलाई ५
शुभ समय मार्गदर्शिका: नए कार्य आरंभ करने, यात्रा और शुभ अनुष्ठानों के लिए ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित और अमृत काल परंपरागत रूप से चुने जाते हैं।
अशुभ काल
- ०८:५७ पूर्वाह्न – १०:३८ पूर्वाह्न
- यमगंड०२:०० अपराह्न – ०३:४१ अपराह्न
- गुलिक काल०५:३५ पूर्वाह्न – ०७:१६ पूर्वाह्न
- दुर्मुहूर्त०५:३५ पूर्वाह्न – ०६:२९ पूर्वाह्न
- वर्ज्यम्०९:२२ अपराह्न – ११:०४ अपराह्न
- बाण दोषअग्नि
- भद्रा (विष्टि)कोई नहीं
- विंचुडोकोई नहीं
- पंचकपूरा दिन
- कोई नहीं
- ०१:४३ अपराह्न – ०५:३५ पूर्वाह्न, जुलाई ५
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
- कोई नहीं
परम्परागत निर्देश: राहुकाल व यमघण्ट में शुभ कार्य, नवीन निवेश एवं यात्रा वर्जित मानी जाती है।
ऋतु एवं अयन
निवास, शूल एवं वास
मन्त्री मण्डल (ग्रह परिषद)
चंद्रबलम्
ताराबलम्
पंचक रहित मुहूर्त चक्र
उदय लग्न समय
अन्य कैलेंडर एवं युग गणना
पर्व, व्रत एवं अनुष्ठान
संकष्टी चतुर्थी
प्रमुख पर्वप्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विघ्नहर्ता गणेश जी की कृपा व संकट निवारण हेतु पावन व्रत, जो चंद्रोदय के पश्चात खोला जाता है।
जीवन के समस्त संकटों का नाश, आर्थिक व मानसिक बाधाओं का निवारण, बुद्धि, विद्या और परिवार में सुख-समृद्धि की प्राप्ति।
- ✦प्रातःकाल गणेश जी का षोडशोपचार पूजन
- ✦संकटनाशन गणेश स्तोत्र का ११ या २१ बार पाठ
- ✦तिल के लड्डू और मोदक का भोग तैयार करना
- ✦चंद्रोदय समय का अवलोकन कर चंद्र अर्घ्य देना
- ✦गणेश आरती एवं प्रसाद वितरण
पञ्चाङ्ग के पाँच अंग एवं दैनिक पञ्चाङ्ग
तिथि
1सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२° के कोणीय अंतर को तिथि कहते हैं। यह व्रत, पर्व और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्धारण का मुख्य आधार है।
नक्षत्र
2चन्द्रमा जिस २७ नक्षत्र मंडलों (१३° २०' प्रत्येक) में भ्रमण करता है, वह नक्षत्र कहलाता है। यह मानसिक प्रकृति और दैनिक ऊर्जा को प्रभावित करता है।
योग
3सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग २७ भागों में विभाजित होता है, जिसे योग कहते हैं। यह दिन के वातावरण और अंतःकरण की शुद्धि का सूचक है।
करण
4एक तिथि के आधे भाग (६°) को करण कहते हैं। यह विशिष्ट कार्यों और मुहूर्तों के सूक्ष्म चयन हेतु उपयोगी है।
वार
5सात ग्रहों के आधिपत्य वाला वार (दिन), जो स्थानीय सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के २४ घंटों के चक्र को नियंत्रित करता है।