षड्विंशोऽध्यायः: श्रावणाम्बावास्याव्रतम्
The Pola vrata of the bulls, told through Nandi's boon after he killed the daitya Andhaka, and the rules for gathering kusha (darbha) on the new moon of Shravana.
अध्यायपरिचयः
- अध्यायः
- षड्विंशोऽध्यायः
- विषयः
- श्रावणाम्बावास्याव्रतम्
- मूलम्
- शिवपुराणं, स्कन्दपुराणम् (सनत्कुमारसंहिता)
- वक्ता
- सूतः (शौनकादिमुनिभ्यः)
- मासः
- श्रावणमासः
षड्विंशोऽध्यायः: सम्पूर्णा कथा
7 अनुच्छेदाःभगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, "अब तुम श्रावण मास की अमावस्या को क्या करना चाहिए, उसके बारे में सुनो। मैंने बहुत समय पहले महाबली, पराक्रमी, संसार-विध्वंसक, देवताओं को हराने वाले दुष्ट दैत्यों के साथ अपने वृषभ पर सवार होकर संग्राम किया था। परन्तु महाबली और पराक्रमी वृषभ ने मेरा साथ युद्ध में कभी नहीं छोड़ा। अन्धकासुर दैत्य ने एक बार वृषभ के शरीर पर तीव्र आघात किया जिससे उसके शरीर से खून बहने लगा। केवल उसके प्राणों की ही रक्षा हो पायी। इस अवस्था में जब मैं दैत्य को मारने चला तो भी उसने मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैंने उस समय नन्दीश्वर के पराक्रम को देखा कि उसने अन्धक दैत्य का अपने सींगों के प्रहार से वध कर डाला। मैं नन्दी के इस कार्य से बहुत प्रसन्न हुआ और मैंने उससे वर माँगने को कहा। तुम जो वर माँगोगे उसे मैं अवश्य पूरा करूंगा।"
नन्दीश्वर बोला, "मुझे कुछ नहीं चाहिये। आप मुझ पर प्रसन्न हैं इससे बढ़कर मेरे लिए और क्या वरदान हो सकता है। फिर भी संसार की भलाई के लिए आपसे प्रार्थना करता हूँ। आज श्रावण मास की अमावस्या है। आज के दिन गौ के सहित मृत्तिका बैलों का पूजन हो और कामधेनु सदृश्य मेरा जन्म हो।"
मनुष्य भक्ति द्वारा प्रत्यक्ष गौ तथा बैलों का पूजन करें। गेरू से तथा धातुओं से उनके शरीर को सजायें। सींगों को सोने, चाँदी से मढ़ें। दोनों सींगों में रेशमी गुच्छे बाँधकर चित्र-विचित्र नाना रंगों से मिश्रित कपड़े को पीठ पर ढक कर गले में सुमधुर आवाज करने वाली घंटियाँ बाँधें। दिन में गाँव के बाहर ले जाकर शाम को घर वापिस ले आएँ। खली, बिनौले उन्हें खाने को दें। जो ऐसा करे उनके यहाँ गोधन की वृद्धि हो। मैंने वृषभ से कहा, "तुमने जो माँगा है वह सब तुमको अवश्य मिलेगा।"
जो वृषभ आज के दिन किसी काम में न लगाया गया हो, केवल भूसा खाता हो, पानी पीता हो, उसे पोल कहते हैं। उसी नाम से आज का दिन भी पोल कहा जायेगा। आज का दिन जगत् में पोला के नाम से प्रसिद्ध होगा। मनुष्य को आज के दिन सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाले बैलों का उत्सव मनाना चाहिए।
हे सनत्कुमार! अब मैं तुम्हें कुशोत्पाटिनी (कुशाग्रहण) विधि बताता हूँ। श्रावण मास की अमावस्या के दिन स्नान करके पवित्र होकर कुशोत्पाटन करना चाहिये। कुश को बार-बार प्रयोग करने पर भी वह शुद्ध रहता है। कुश, काश, भव, दूर्वा, खस, कुंदक, गेहूँ, चावल, मूंज और घास- यह कुशा के दस भेद बताये हैं। "ब्रह्मा द्वारा नैसर्गिक उत्पन्न दर्भ मेरे सब पापों को नष्ट करें। स्वस्तिकारक हों।" यह मंत्र कहकर पूर्व उत्तर के बीच ईशान कोण में मुख करके "हूं फट्" मंत्र द्वारा एक ही बार कुश उखाड़ना चाहिये।
जिन कुशों के अग्र भाग सूखे न हों ऐसे हरे रंग के कुश देवकार्य और जपादि कर्म में, जड़रहित कुश पितृ कार्य में रखना चाहिये। देवकार्य और पितृ कार्य के लिये सात पत्र के कुश उत्तम बताये गये हैं। मध्य में पत्र न हो, ऐसे अग्र भाग सहित आदेश प्रमाण कुश पवित्रा में रखने योग्य हैं। ब्राह्मण के लिए चार कुश का पवित्रा, क्षत्रिय के लिए तीन कुश का पवित्रा, वैश्य के लिए दो कुश का पवित्रा और शूद्र के लिए एक कुश का पवित्रा देना चाहिये।
उत्पवनार्थ के लिए, वर्णों के लिए दो पवित्रा होते हैं। पचास का ब्रह्मा तथा पच्चीस का विष्टर होता है। पवित्रा को आचमन करते समय हाथ से न निकालें। विकिट, अग्निकारण तथा पाद्य समाप्ति पर पवित्रा को त्याग देना चाहिये। दर्भ तुल्य पुण्यदाता अन्य कोई पवित्रा पापनाशक नहीं है। जितने देव और पितृ कार्य हैं वह सब दर्भाधीन हैं। अमावस्या के दिन ऐसे दर्भों को स्वीकार करना चाहिये। यह दर्भ कभी बासी नहीं होते हैं।