३० अक्टूबर•कृष्णपक्षः पञ्चमी
← सर्वे त्रिंशदध्यायाः (सूची)
अध्यायः 22 / 3010 निमेषाः

द्वाविंशोऽध्यायः: सङ्कटहरणव्रतम्

The Sankata Harana vrata of Ganesha: the resolve, worship, the twenty-one names, arghya to the Moon and the udyapana, and those who kept it, including Parvati, Agastya, Damayanti, Rukmini and Pradyumna.

अध्यायपरिचयः

अध्यायः
द्वाविंशोऽध्यायः
विषयः
सङ्कटहरणव्रतम्
मूलम्
शिवपुराणं, स्कन्दपुराणम् (सनत्कुमारसंहिता)
वक्ता
सूतः (शौनकादिमुनिभ्यः)
मासः
श्रावणमासः

द्वाविंशोऽध्यायः: सम्पूर्णा कथा

7 अनुच्छेदाः

सनत्कुमार ने भगवान सदाशिव से पूछा, "हे भगवन्! श्रावण शुक्ल चतुर्थी के दिन सर्वकाम फलप्रद संकटहरण देवादेव का किस विधि से व्रत तथा पूजन करें, कब उद्यापन करें? मुझे विस्तार पूर्वक बताने का कष्ट करें।"

भगवान शंकर ने कहा, "चतुर्थी के दिन सुबह उठकर दातुन आदि करके पुण्यदाता शुभ संकट हरण नाम का व्रत का संकल्प करना चाहिये। हे देवेश! मैं आज चन्द्रमा के उदय होने तक निराहार रहूँगा। आपकी पूजा कर भोजन करूँगा। मेरे ऊपर आये संकट को दूर करें। इस प्रकार संकल्प कर काले तिलों से स्नान कर गणाधिपति की पूजा करनी चाहिये।"

अपनी सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण, चाँदी या ताँबे की गणेश जी की मूर्ति बनवायें। यदि इतना न हो सके तो मिट्टी की प्रतिमा कुम्हार से बनवायें। पहले अष्टदल कमल के ऊपर घट स्थापित करना चाहिये। उसमें जल भरकर स्वच्छ वस्त्र से ढक दें और उसके ऊपर प्रतिमा रखकर षोड्श उपचार द्वारा वैदिक मन्त्रों या तान्त्रिक मन्त्रों से पूजा करनी चाहिये।

शुद्ध घी के तिल का दस लड्डू बनाये। उनमें से पाँच गणेश जी के लिये रखें। भक्ति द्वारा देवता की भाँति ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिये। और दक्षिणा देकर प्रार्थना करनी चाहिये आपके निमित्त इन पाँच लड्डूओं को फलों तथा दक्षिणा सहित दे रहा हूँ। आप इन्हें ग्रहण करें। आपत्ति से मेरा उद्धार करें। जो कुछ मैंने द्रव्यहीन कम या अधिक दिया है। हे विप्र रूप गणेश्वर! वह सब परिपूर्ण हो। इसके बाद ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन कराना चाहिये और चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत करने वाले पर गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। इस व्रत के करने से विद्यार्थी को विद्या, धनवान को धन और पुत्र की अभिलाषा करने वाले को पुत्र प्राप्त होता है। रोगी को रोग से छुटकारा मिल जाता है।

अब मैं तुम्हें पूजा तथा जप के मन्त्र बतलाता हूँ। पहले 'ओंकार' शब्द फिर 'नमः' फिर 'हे रम्ब' के बाद 'लंबोदर' शब्द उसके बाद 'संकट निवारण' शब्द को चतुर्थ्यान्त बनाकर, अन्त में 'स्वाहा' शब्द कहना चाहिये। वैसे यह २१ अक्षरों का मंत्र है। मनुष्य को दसों दिशाओं की पूजा करनी चाहिये। निम्नलिखित २१ नामों द्वारा गणेश जी की पूजा करनी चाहिये- उमापुत्र, अग्नाशन, एकदन्त, दंतवक्त्र, मूषकवाहन, विनायक, ईशपुत्र, सर्वसिद्धि प्रदायक, गणाध्यक्ष, स्कन्दगुरो, सर्वसंकटनाशक, लम्बोदर, गोर्यमंगलसम्भव, धूम्रकेतो, भालचन्द्र, असुरमर्दन, विद्याविधान, विकट शूर्पकर्ण, विघ्नराट, अघनाशन।

आप मुझ पर प्रसन्न हो। मेरी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करें। हे प्रभु! मेरे शत्रुओं की बुद्धि का नाश हो तथा मेरे मित्रों का अभ्युदय हो। इस प्रकार प्रार्थना करके अष्टोत्तरशत होम करना चाहिये। व्रत की समाप्ति पर गणेश के प्रीत्यार्थ लड्डुओं का ब्राह्मणों को बायना देना चाहिये। आगे दिये मन्त्र से पाँच बार चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिये। क्षीरोदार्णवसंभूत!! अग्निगोत्रसमुदभूत! शारीन! रोहिणी सहित मेरे दिये हुये इस अर्घ्य को स्वीकार करें। तत्पश्चात ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करवाना चाहिये फिर स्वयं भोजन करना चाहिये। चार मास तक यह व्रत करने के बाद पाँचवें मास में उद्यापन करना चाहिये। साधक को पहले व्रत कुण्ड की शक्ति अनुसार मूर्ति बनानी चाहिये। प्रथम विधि से पूजा करके सुगन्धित चन्दन तथा नाना प्रकार के फूलों द्वारा पूजा करनी चाहिये। सूप और पायस, दक्षिणा सहित गणेश की प्रतिमा कपड़े से लपेट कर ब्राह्मण को देना चाहिये। व्रत समाप्ति के लिये पाँच सेर तिल देना चाहिये और क्षमा प्रार्थना करनी चाहिये। इस प्रकार उद्यापन करने मात्र से ही अश्वमेघ फल की प्राप्ति होती है।

सनत्कुमार मेरे कहने से पूर्व पार्वती ने इस व्रत को चार मास तक संकल्प की प्राप्ति के लिये किया था। पाँचवें मास में उन्होंने पुत्र कार्तिकेय को प्राप्त किया था। महर्षि अगस्त्य ने समुद्रपान के समय इसे किया था। तीन मास पश्चात् उन्हें विघ्नेश के प्रसादस्वरूप सिद्धि प्राप्त हो गई थी। हे मुनिश्वर! इस व्रत को दमयन्ती ने छः मास तक किया था तभी उसने महाराज नल के दर्शन किये थे। अनिरुद्ध को खोजती चित्रलेखा ने इस व्रत को किया। "वह कहाँ गये? उन्हें कौन ले गया? वाणासुर के यहाँ जाने पर प्रद्युम्न व्याकुल हो गये, तब उनसे रुक्मणी ने बड़े प्रेम से कहा, "पुत्र! मैं तुमसे जिस व्रत को कहने जा रही हूँ उसे ध्यानपूर्वक सुनो - पूर्व समय में तेरे जन्मकाल के समय मेरे सौरी घर से तुझको एक राक्षस चुराकर ले गया था। बस मेरा हृदय तेरे वियोग से छलनी हो गया। मैं रोती थी कि मैं अपने लाल का मुख कब देखूँगी? उस समय जब दूसरी स्त्रियों के पुत्रों को देखती तो पुत्र वियोग से पागल हुई मैं कहती कहीं यह मेरा पुत्र तो नहीं? इस तेरे वियोग का दुःख झेलते हुये कई वर्ष व्यतीत हो गये। प्रभु कृपा से हमारे यहाँ लोमश ऋषि आ गये उन्होंने मेरी दशा को देखकर मुझसे संकट चतुर्थी का व्रत करने को कहा। उनकी आज्ञानुसार मैंने चार बार यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से तुमने वापिस लौटकर शम्बरासुर का वध किया था। अतः यदि तुम भी इस व्रत को करोगे तो अवश्य ही तुम्हारे पुत्र का पता चल जायेगा और वह घर वापिस लौट आयेगा। माता के आदेशानुसार प्रद्युम्न ने भी गणेश जी के प्रीत्यार्थ विधिवत् इस व्रत को किया। तभी नारद जी ने आकर उनको बताया कि अनिरुद्ध वाणासुर पुरी में है। उसी समय प्रद्युम्न वाणासुर पुरी में गये और वाणासुर को सैन्य सहित जीतकर अपने पुत्र को पुत्रवधू सहित ले आये। प्राचीन काल में दूसरे देवताओं ने भी विघ्नेश के प्रीत्यर्थ इस व्रत को किया था। मृत्युलोक में इस व्रत के समान सिद्धि देने वाला और कोई व्रत नहीं है। अधिक कहने से क्या लाभ? इस व्रत का उपदेश नास्तिक और शठ को नहीं देना चाहिये। शिष्य या श्रद्धायुक्त साधु को तुम इसका उपदेश दे सकते हो। हे महामुने तुम धर्मिष्ठ विघ्ननन्दन तथा मेरे प्रिय हो, इसलिये मैंने तुमको इस व्रत का उपदेश दिया है।"

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये द्वाविंशोऽध्यायः सम्पूर्णम् ॥

श्रावणमासस्य अन्यानि व्रतानि पर्वाणि च