३० अक्टूबर•कृष्णपक्षः पञ्चमी
← सर्वे त्रिंशदध्यायाः (सूची)
अध्यायः 15 / 3011 निमेषाः

पञ्चदशोऽध्यायः: सूपोदनव्रतम्

The Supodana vrata of the bright shashthi, with the story of King Rohita's short-lived son Shivadatta, brought back to life through a young girl's faith in Shiva and Parvati.

अध्यायपरिचयः

अध्यायः
पञ्चदशोऽध्यायः
विषयः
सूपोदनव्रतम्
मूलम्
शिवपुराणं, स्कन्दपुराणम् (सनत्कुमारसंहिता)
वक्ता
सूतः (शौनकादिमुनिभ्यः)
मासः
श्रावणमासः

पञ्चदशोऽध्यायः: सम्पूर्णा कथा

13 अनुच्छेदाः

भगवान शंकर ने सनत्कुमार को बताया कि श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को महा मृत्यु विनाशक उत्तम "सूपोदान" नामक व्रत किया जाता है। मंदिर में या घर पर रहकर ही शिवजी की पूजा करने के बाद दाल, आटा, चावल का नैवेद्य, नमक सहित आम की सब्जी रखनी चाहिये। ब्राह्मणों को नैवेद्य पदार्थों का बायना देना चाहिए। जो व्यक्ति नियम पूर्वक इस व्रत को करता है, उसे बड़े भारी अनन्त पुण्य प्राप्त होते हैं। इस संबंध में मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ।

प्राचीन काल में एक राजा था। उसका नाम रोहित था। बहुत समय तक उसे सन्तान का मुख देखने को न मिला। उसने सन्तान प्राप्ति हेतु कठिन तप किया। तपस्या के प्रभाव से ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने राजा से कहा, "तुम्हारे भाग्य में सन्तान का सुख नहीं है।" परन्तु राजा ने अपनी तपस्या नहीं छोड़ी। भक्त ने प्रभु को दुबारा प्रकट होने के लिए मजबूर कर दिया। ब्रह्माजी दुबारा प्रकट हुए और राजा रोहित से बोले, "मैं तुम्हें पुत्र तो दे सकता हूँ परन्तु वह अल्पायु होगा।"

इस पर राजा और रानी ने सोचा कि पुत्र प्राप्ति से बंध्यापन तो हट जायेगा। लोक में पुत्र न होने की निन्दा तो समाप्त हो जायेगी। हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है। राजा और रानी ने अल्पायु पुत्र के लिए ही अपनी सहमति प्रदान कर दी। समय आने पर ब्रह्माजी के वरदान से रानी को पुत्र पैदा हुआ। राजा ने पुत्र के जातकर्म बड़ी धूमधाम से किया। बालक का नाम शिवदत्त रखा गया। अल्प आयु होने के कारण राजा ने राजकुमार शिवदत्त का विवाह नहीं किया। सोलह वर्ष की अवस्था में उसका निधन हो गया। ब्रह्मचारी के रूप में शिवदत्त का निधन हो जाने से राजा दिन-रात चिन्तित रहने लगा क्योंकि जिस वंश में ब्रह्मचारी की मृत्यु हो जाती है, वह वंश नष्ट हो जाता है।

सनत्कुमार ने भगवान शिव से पूछा, "क्या इसका कोई उपाय नहीं है? यदि कोई उपाय हो तो मुझे बतायें जिसके करने से दोष दूर हो जाये।"

भगवान शकर बोले, "मृतक यदि स्नातक या ब्रह्मचारी है तो उसका अर्क विधि से विवाह संयोग करके पीपल का पेड़ तथा ब्रह्मचारी को मिलाकर देश, काल, गोत्र तथा नाम का उच्चारण करते हुए कहना चाहिए कि मैं मृतक ब्रह्मचारी की शान्ति के लिए नैसर्गिक व्रत करता हूँ। सोने से आभ्युदयिक करके पीपल के वृक्ष की शाखा तथा शव को हल्दी और तेल से लेप कर पीले सूत द्वारा वेष्टित करना चाहिये। फिर अग्नि की स्थापना करके विवाह विधि द्वारा आधारान्त हवन कर अग्नि, बृहस्पति, काम, चार व्याहृतियों से हवन कर स्विष्कृत संज्ञक होम कर, कर्म को समाप्त करें। इसके बाद पीपल की डाल तथा मृत शव का अग्नि संस्कार करना चाहिये।"

मृत्यु की सम्भावना हो तो इस व्रत को छः वर्ष तक करना चाहिये। तीस ब्रह्मचारियों को नये कौपीन देना चाहिये। खड़ाऊँ, छत्र, माला, चन्दन, मणि, प्रवाल तथा आभूषण देने चाहिएँ। इस प्रकार करने से कोई विघ्न नहीं रहता।

राजा ने इस विधि को ब्राह्मण के मुख से सुनकर सोचा कि यह अमुख्य अर्क विवाह मुझे अच्छा नहीं लगा। विवाह होना ही मुख्य बात है। मैं राजा हूँ, जो कोई इस लड़के के साथ अपने पुत्री की शादी करेगा, मैं उसे धन दौलत से मालामाल कर दूँगा। उसके राज्य में एक ब्राह्मण रहता था जो किसी कार्य से बाहर गया हुआ था। उसकी प्रथम पत्नी से एक पुत्री थी। उसकी दूसरी पत्नी बड़ी दुष्ट प्रकृति की थी। उसने धन के लालच में लड़की को देना स्वीकार कर लिया। उसने एक लाख रुपया लेकर अपनी सौत की दस वर्षीय कन्या को राजा के मृत पुत्र के साथ शादी कर दी।

उस बाला को लेकर राजा के सेवक श्मशान भूमि में गये और शव के साथ उस लड़की को सती होने की व्यवस्था करने लगे। तब वह अबोध बाला बोली, "आप यह क्या कर रहे हैं? लड़की की बात सुनकर वे सब दुःखी मन से कहने लगे, "तुम्हारा पति मर गया है। तुम्हें इसके साथ सती होना है।" यह सुनकर लड़की रोने लगी और बोली, "आप मेरे स्वामी को क्यों जलाते हैं, मैं उन्हें जलाने नहीं दूंगी। आप सब लोग जायें, मैं यहाँ अकेली रहूँगी, यह जब उठेंगे तब उनके साथ ही आऊँगी।"

लड़की का हट देखकर सब करुणा से द्रवित होकर चले गये। अब छोटी सी लड़की जो न कुछ समझती थी, न जानती थी, शव के पास अकेली बैठकर भगवान शिव-पार्वती को याद करने लगी। बार-बार पुकारने पर करुणा के सागर शिव-पार्वती नन्दी पर सवार होकर श्मशान में लड़की के पास पहुँचे। बालिका ने जब शिव- पार्वती को देखा तो वह उनके चरणों में गिरकर अपने पति के प्राणों की भीख माँगने लगी।

शिव-पार्वती बालिका के बाल स्वभाव से प्रभावित होकर बोले, "तुम्हारी माता ने सूपोदान का व्रत किया था। तिल तथा जल लेकर उसके फल का संकल्प कर अपने पति को दो तथा अपने मृत पति से कहो, "मेरी माँ ने सूपोदान नामक व्रत किया था, उसके प्रभाव से मेरा पति पुनः जीवित हो जाये। भोली-भाली बालिका ने भगवान शिव-पार्वती के आदेशानुसार वैसा ही किया। शिवदत्त तुरन्त ऐसे उठकर बैठ गया जैसे कोई सोता हुआ उठकर बैठ जाता है। शिव-पार्वती उस बालिका को व्रतोपदेश देकर अन्तर्धान हो गये।"

शिव-पार्वती के अन्तर्धान होने के बाद शिवदत्त ने उस बालिका से पूछा, "तुम कौन हो? मैं यहाँ श्मशान भूमि में क्यों हूँ? बालिका ने सारी कथा उसे बता दी। अगले दिन नदी के तट पर स्नान करने के लिए आये हुए लोगों ने वापिस लौटकर राजा को बताया कि उसका पुत्र उस बालिका के प्रभाव से जीवित हो गया है।"

यह सुनकर राजा की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वह प्रसन्न होकर गाजे-बाजे के साथ नदी तट पर आया। राजा ने पुत्र वधू की प्रशंसा की। मेरी यह पुत्र वधू सुभागा और धन्य है। इसके सजीव पुण्य से राजकुमार को जीवन दान मिला है। राजा ने ब्राह्मणों को दान दिया और भगवान शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना की। ब्राह्मणों के कहने के अनुसार नगर में प्रवेश करने हेतु शान्ति यज्ञ किया।

मनुष्यों को चाहिए कि इसे पाँच वर्ष तक व्रत करने के बाद उद्यापन करें। शंकर-पार्वती का प्रतिदिन अर्चन कर, पूर्व विधान से व्रत में नैवेद्य तथा बायना देना चाहिये। इस व्रत के करने से प्राणी चिरायु पुत्र प्राप्त कर अन्त में शिव लोक को जाता है।

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये पञ्चदशोऽध्यायः सम्पूर्णम् ॥

श्रावणमासस्य अन्यानि व्रतानि पर्वाणि च