श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय में उल्टे पीपल के पेड़ का क्या अर्थ है?

प्रकाशित:
3 मिनट में पढ़ें
श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय में उल्टे पीपल के पेड़ का क्या अर्थ है?

श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय के इन दो श्लोकों में संसार की तुलना एक उल्टे पीपल के पेड़ से की गई है, जिसकी जड़ें ऊपर परमात्मा में और शाखाएं नीचे फैली हैं। ये श्लोक मोह-माया से मुक्ति पाकर परमात्मा की शरण में जाने और जीवन के दुखों से पार पाने का मार्ग दिखाते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय में उल्टे पीपल के पेड़ का क्या अर्थ है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऊपर की ओर जड़ वाले और नीचे की ओर शाखाओं वाले इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहा गया है। इस पेड़ के पत्ते वैदिक मंत्र हैं। जो व्यक्ति इस पेड़ के रहस्य को जान लेता है, उसे ही वेदों का ज्ञाता कहा जाता है।

प्रथम श्लोक

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥

ऊपर की ओर मूल (जड़) और नीचे शाखाओं वाले इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहा गया है, जिसके पत्ते वैदिक छंद हैं और इसे जानने वाला ही वेदों का ज्ञाता है।

संसार रूपी उल्टे वृक्ष की जड़ें ऊपर और शाखाएं नीचे क्यों बताई गई हैं?

यह श्लोक सिखाता है कि यह संसार एक उल्टे पेड़ के समान है, जिसकी असली जड़ें परमात्मा में हैं और शाखाएं भौतिक दुनिया में फैली हैं। सच्ची शांति पाने के लिए हमें केवल नश्वर चीजों में सुख ढूंढने के बजाय अपनी चेतना को अपनी जड़ों यानी परमात्मा से जोड़ना चाहिए। इस परिवर्तनशील माया को समझकर परमात्मा से जुड़ना ही जीवन का सर्वोच्च ज्ञान है।

मोह-माया और दुखों के बंधन से मुक्ति पाने का मार्ग श्रीकृष्ण ने क्या बताया है?

गीता के पांचवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने मोह-माया और दुखों से छूटने का स्पष्ट मार्ग बताया है। जो व्यक्ति अहंकार और सांसारिक मोह-माया से मुक्त हो जाता है, तथा भगवान की भक्ति में लीन रहता है, वही व्यक्ति ईश्वर के अविनाशी परम धाम को प्राप्त करता है।

पंचम श्लोक

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥

जो अहंकार और मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है और कामनाओं से रहित होकर आत्मस्वरूप में स्थित हैं, वे मूर्ढ़ता से दूर होकर उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।

परमात्मा के परम धाम या शरण को प्राप्त करने का सरल तरीका क्या है?

जीवन में जो व्यक्ति झूठे अहंकार और मोह से मुक्त है, जिसने आसक्ति को जीत लिया है और सांसारिक कामनाएं छोड़ दी हैं, वही इस बंधन से पार पाता है। जो निरंतर आत्म-ज्ञान में स्थित रहकर सुख-दुःख की सभी स्थितियों में शांत रहता है, वही ज्ञानी मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करता है।

मुख्य सीख

संसार के प्रति मोह और आसक्ति को छोड़कर विवेक, ज्ञान और भक्ति के साथ परमात्मा की शरण में जाना ही जीवन के दुखों और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने का एकमात्र सच्चा मार्ग है।

यह भी देखें

Share: