2 November•Krishna Paksha Ashtami

श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग बताया गया है?

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श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग बताया गया है?

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में जीवन और मोक्ष के गहरे रहस्य बताते हुए कहा है कि परम ज्ञान का आश्रय लेने वाले साधक जन्म-मरण के चक्र से हमेशा के लिए मुक्त हो जाते हैं। इन श्लोकों के माध्यम से उन्होंने प्रकृति और जीव के संबंध को समझाते हुए सभी प्राणियों में ईश्वर के अंश को देखने का मार्ग दिखाया है।

श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में श्रीकृष्ण ने मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग बताया है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन और संसार का सरल रहस्य समझाया है। एक श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति सही ज्ञान को समझ लेता है, वह परमात्मा से जुड़ जाता है। इस परम ज्ञान को पाकर साधक जन्म और मरण के सांसारिक चक्र से सदैव के लिए मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

गीता श्लोक

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

इस परम ज्ञान का आश्रय लेकर जो साधक मेरे स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं, वे सृष्टि की रचना के समय दोबारा जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय विचलित नहीं होते।

मोक्ष प्राप्त करने वाले ज्ञानी पुरुष की स्थिति कैसी होती है?

परम ज्ञान को प्राप्त करने वाला ज्ञानी पुरुष जन्म और मरण के चक्र से पूरी तरह छूट जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, ऐसे साधक न तो सृष्टि की रचना के समय दोबारा जन्म लेते हैं और न ही महाप्रलय के समय किसी भी प्रकार से दुखी या विचलित होते हैं। वे हर स्थिति में शांत रहकर परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में क्या रहस्य साझा किए हैं?

सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य को समझाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि इस संसार के सभी जीवों की उत्पत्ति का आधार प्रकृति और ईश्वर दोनों मिलकर तय करते हैं। प्रकृति सभी योनियों में उत्पन्न होने वाले जीवों को स्थूल शरीर प्रदान करती है, जबकि परमात्मा उनमें जीवात्मा रूपी चेतना स्थापित करने वाले पिता हैं।

उत्पत्ति श्लोक

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

विभिन्न योनियों में जितने भी जीव उत्पन्न होते हैं, उन सबकी माता मूल प्रकृति है और मैं उनमें चेतना स्थापित करने वाला पिता हूँ।

इन श्लोकों से जीवन में क्या सीख मिलती है?

इन श्लोकों के ज्ञान को जीवन में अपनाकर व्यक्ति अनेक प्रकार के विकारों और बंधनों से दूर हो सकता है। इनसे मिलने वाली प्रमुख सीख निम्नलिखित हैं:

  • व्यक्ति को जीवन में आत्मज्ञान प्राप्त कर सुख-दुख और हर उतार-चढ़ाव में शांत रहना चाहिए।
  • ईश्वर की शरण में जाने पर संकट या मृत्यु का भय नहीं सताता है।
  • हर प्राणी में ईश्वर का अंश देखकर भेदभाव, घमंड और नफरत का त्याग करना चाहिए।
  • सभी जीवों के प्रति दया, समानता और प्रेम का भाव रखना चाहिए।

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