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अहोई अष्टमी 2026: कौन हैं अहोई माता और क्या है व्रत की पूजा विधि?

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अहोई अष्टमी 2026: कौन हैं अहोई माता और क्या है व्रत की पूजा विधि?

अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से संतान की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए रखा जाता है। अहोई माता, जिन्हें मां पार्वती का स्वरूप माना जाता है, बच्चों की रक्षा करती हैं और उन्हें आशीर्वाद देती हैं। करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद आने वाले इस व्रत को महिलाएं अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ रखती हैं।

अहोई माता कौन हैं और इनकी पूजा क्यों की जाती है?

अहोई माता को मां पार्वती का स्वरूप मानकर पूजा जाता है और इन्हें संतान की रक्षा करने वाली माता माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इनकी पूजा से बच्चों का भाग्य अच्छा होता है और उन्हें लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है। ऐसा माना जाता है कि यदि कोई महिला इस व्रत को विधि-विधान से करती है, तो घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और निःसंतान महिलाओं को भी संतान सुख की प्राप्ति होती है।

अहोई अष्टमी का व्रत किसके लिए रखा जाता है?

यह व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना के लिए रखती हैं। इस व्रत को करने के साथ महिलाएं अहोई माता से बच्चों की रक्षा और उनके अच्छे भाग्य का आशीर्वाद मांगती हैं। व्रती महिलाओं के बच्चों समेत पूरे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

अहोई अष्टमी व्रत की पूजा विधि और नियम क्या हैं?

इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 01 नवंबर, रविवार को मनाया जाएगा। इस व्रत को आमतौर पर निर्जला रखा जाता है और शाम के समय विधि-विधान से अहोई माता की पूजा की जाती है।

  • दीवार पर गेरू या कागज के चित्र में अहोई माता, साही और उसके बच्चों की आकृतियां बनाई जाती हैं।
  • माता के चित्र में आठ कोनों वाला घर और सूर्य-चंद्रमा भी उकेरे जाते हैं।
  • संध्या बेला में माता की पूजा कर कथा सुनी जाती है।

शुभ मुहूर्त और नियम

अहोई अष्टमी का व्रत 01 नवंबर, रविवार को है। इस व्रत में दिनभर निर्जला उपवास रखकर शाम को तारों को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है।

अहोई अष्टमी व्रत में तारों को अर्घ्य देने का क्या महत्व है?

अहोई अष्टमी के व्रत में चंद्रमा की बजाय आकाश में तारे देखकर उन्हें जल अर्पित करने का विधान है। संध्याकालीन पूजन और कथा श्रवण के बाद तारे निकलने पर महिलाएं उन्हें अर्घ्य देती हैं और इसके बाद ही अपना व्रत खोलती हैं।

अहोई अष्टमी की व्रत कथा क्या है?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में एक साहूकार के सात पुत्र थे। एक दिन दीपावली के लिए मिट्टी खोदते समय साहूकार की पत्नी से गलती से साही (स्याहु) के बच्चे की मौत हो गई, जिससे दुखी होकर उसने शाप का सामना किया। अपनी इस गलती पर महिला ने बहुत पश्चाताप किया और माता पार्वती की कठोर तपस्या की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उसे क्षमा कर दिया और उसकी संतान की रक्षा का आशीर्वाद दिया, जिसके बाद से ही यह व्रत परंपरा बन गया।

अहोई माता के चित्र में साही और उसके बच्चों का क्या प्रतीक है?

अहोई माता के चित्रण में साही और उसके बच्चों की आकृतियां बनाई जाती हैं, जिसका सीधा संबंध इस व्रत की पौराणिक कथा से जुड़ा है। साही (स्याहु) को संतान की रक्षा और ममता का प्रतीक माना जाता है। इस स्वरूप की पूजा करने से माताएं अपनी संतानों के जीवन की रक्षा की प्रार्थना करती हैं।

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