कृष्ण पक्ष अमावस्या • ०% प्रकाशअमावस्या
दैनिक पंचांग

दैनिक पंचांग, ३० सितंबर २०२७

३०, भाद्रपदकृष्ण पक्ष, अमावस्या
२०८३ गुजराती संवत
३०
सितंबर २०२७
गुरुवार
पर्व एवं व्रत सूची:दर्श अमावस्याअन्वाधानइष्टिभाद्रपद अमावस्याचातुर्मास अवधि∞योग:ब्रह्मसिद्ध योग

पञ्चाङ्ग के पाँच अंग

तिथि

समाप्ति समय ०८:०५ पूर्वाह्न
अगला: प्रतिपदा

नक्षत्र

समाप्ति समय ०२:११ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
अगला: चित्रा

योग

समाप्ति समय ०९:०८ अपराह्न
अगला: इन्द्र

करण

समाप्ति समय ०८:०५ पूर्वाह्न
अगला: किंस्तुघ्न

वार

गुरुवार
वार (गुरू)
ग्रह स्वामी: गुरू

२४ घंटे का दैनिक प्रवाह (सूर्योदय से सूर्योदय)

स्थानीय सौर दिवस
०६:०६ पूर्वाह्न (सूर्योदय)१२:०००६:०३ अपराह्न (सूर्यास्त)००:०००६:०६ पूर्वाह्न, अक्टूबर १ (अगला सूर्योदय)
तिथि
अमावस्या
प्रतिपदा
नक्षत्र
हस्त (समाप्ति समय ०२:११ पूर्वाह्न, अक्टूबर १)
चित्रा
योग
ब्रह्म (समाप्ति समय ०९:०८ अपराह्न)
इन्द्र
करण
नाग
किंस्तुघ्न (समाप्ति समय ०६:४७ अपराह्न)
बव

सूर्य एवं चन्द्र

सूर्य

सूर्योदय
०६:०६ पूर्वाह्न
सूर्यास्त
०६:०३ अपराह्न
सूर्य राशि: कन्यादिनमान: ११ घंटे ५६ मिनटमध्याह्न (सौर दोपहर): १२:०४ अपराह्न

चन्द्र

चंद्रोदय
None
चंद्रास्त
०६:०१ अपराह्न
चंद्र राशि: कन्यारात्रिमान: १२ घंटे ३ मिनट

विस्तृत पंचांग

कृष्ण पक्ष
तिथि
अमावस्यासमाप्ति समय ०८:०५ पूर्वाह्न• अगला: प्रतिपदा
ब्रह्मसमाप्ति समय ०९:०८ अपराह्न• अगला: इन्द्र
वार
गुरुवार
मास (अमान्त)
भाद्रपद
हस्तसमाप्ति समय ०२:११ पूर्वाह्न, अक्टूबर १• अगला: चित्रा
करण
नाग(०८:०५ पूर्वाह्न)किंस्तुघ्न(०६:४७ अपराह्न)बव(०५:३५ पूर्वाह्न, अक्टूबर १)
पक्ष
कृष्ण पक्ष(कृष्ण पक्ष)
मास (पूर्णिमान्त)
आश्विन

राशि एवं नक्षत्र विवरण

सूर्य नक्षत्र: हस्त (पद १)
चंद्र राशि
कन्या(सम्पूर्ण रात्रि तक)→ तुला (सम्पूर्ण रात्रि से)
सूर्य राशि
कन्या• निरयण प्रणाली
सूर्य नक्षत्र
हस्तपद १
नक्षत्र पद
हस्त (पद १)०९:३० पूर्वाह्नहस्त (पद २)०३:०२ अपराह्नहस्त (पद ३)०८:३६ अपराह्नहस्त (पद ४)०२:११ पूर्वाह्न, अक्टूबर १चित्रा (पद १)जारी
सूर्य भोगांश: १६२.४°चन्द्र भोगांश: १६१.२७°

चन्द्रमास, संवत् एवं बृहस्पति संवत्सर

वि.सं. २०८४ · शक १९४९
विक्रम संवत्
२०८४रौद्र
शक संवत्
गुजराती संवत्
प्रविष्टे / गते
१४(सौर मास दिवस)
बृहस्पति संवत्
दुर्मतितक ०४:२९ pm, शनिवार, १७ अप्रैल २०२७
आगामी संवत्
दुन्दुभी(परवर्ती बृहस्पति वर्ष)
चन्द्रमास
आश्विन(पूर्णिमांत)
भाद्रपद(अमान्त)
संवत्सर चक्र
बार्हस्पत्य ६०-वर्षीय चक्र(उत्तर/दक्षिण परम्परा)

शुभ मुहूर्त

१६ मुहूर्त९ सक्रिय
प्रमुख सौर मुहूर्त (८)८ सक्रिय
  • ब्रह्म मुहूर्त
    ०४:३० पूर्वाह्न – ०५:१८ पूर्वाह्न
  • प्रातः संध्या
    ०४:५४ पूर्वाह्न – ०६:०६ पूर्वाह्न
  • ११:४१ पूर्वाह्न – १२:२९ अपराह्न
  • विजय मुहूर्त
    ०२:०४ अपराह्न – ०२:५२ अपराह्न
  • गोधूलि मुहूर्त
    ०६:०३ अपराह्न – ०६:२७ अपराह्न
  • सायं संध्या
    ०६:०३ अपराह्न – ०७:१५ अपराह्न
  • अमृत काल
    ०६:०२ अपराह्न – ०७:३१ अपराह्न
  • निशीथ मुहूर्त
    ११:४१ अपराह्न – १२:२९ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
शुभ योग (८)१ सक्रिय
✨

शुभ समय मार्गदर्शिका: नए कार्य आरंभ करने, यात्रा और शुभ अनुष्ठानों के लिए ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित और अमृत काल परंपरागत रूप से चुने जाते हैं।

अशुभ काल

१९ काल७ सक्रिय
प्रतिकूल काल एवं दोष (१०)७ सक्रिय
  • ०१:३४ अपराह्न – ०३:०४ अपराह्न
  • यमगंड
    ०६:०६ पूर्वाह्न – ०७:३६ पूर्वाह्न
  • गुलिक काल
    ०९:०५ पूर्वाह्न – १०:३५ पूर्वाह्न
  • दुर्मुहूर्त
    १०:०५ पूर्वाह्न – १०:५३ पूर्वाह्न
  • वर्ज्यम्
    ११:४५ पूर्वाह्न – ०१:१४ अपराह्न
  • बाण दोष
    रोग
  • भद्रा (विष्टि)
    कोई नहीं
  • विंचुडो
    कोई नहीं
  • पंचक
    कोई नहीं
  • ०२:११ पूर्वाह्न – ०६:०६ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
अशुभ योग (९)० सक्रिय
💡

परम्परागत निर्देश: राहुकाल व यमघण्ट में शुभ कार्य, नवीन निवेश एवं यात्रा वर्जित मानी जाती है।

ऋतु एवं अयन

वर्षा ऋतु
दृक अयन
दक्षिणायन
दृक ऋतु
वर्षा ऋतु
नेत्रम्
० (नेत्रहीन - अशुभ/वर्ज्य)
वैदिक अयन
दक्षिणायन
वैदिक ऋतु
वर्षा ऋतु
जीव
० (निर्जीव - अशुभ/वर्ज्य)

निवास, शूल एवं वास

पंचक रहित: शुभ
चन्द्र निवास
दक्षिण(सम्पूर्ण रात्रि तक)→पश्चिम
अग्निवास
पृथ्वी (अत्यंत शुभ)(समाप्ति समय ०८:०५ पूर्वाह्न)→आकाश (अशुभ)
दिशा शूल
दक्षिण(सरसों खाकर यात्रा करें)
शिववास
गौरी (गौरी के साथ)(समाप्ति समय ०८:०५ पूर्वाह्न)→श्मशान
राहु वास
दक्षिण
होमाहुति
सूर्य
कुम्भ चक्र
दक्षिण
पंचक रहित
शुभ

मन्त्री मण्डल (ग्रह परिषद)

राजा
बुध
मन्त्री
बुध
सेनापति
मंगल
सस्याधिपति (ग्रीष्म धान्य)
शनि
धान्याधिपति (शीत धान्य)
गुरू
धनाधिपति (वित्त एवं खजाना)
शुक्र
मेघाधिपति (वर्षा एवं बादल)
मंगल
रसाधिपति (रस एवं तरल पदार्थ)
सूर्य
नीरसाधिपति (धातु एवं रत्न)
शुक्र
फलाधिपति
मंगल

चंद्रबलम्

६ शुभ / अनुकूल१ अष्टम चन्द्र (सावधानी आवश्यक)
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
प्रतिकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
शुभ / अनुकूल
शुभ / अनुकूल
प्रतिकूल
अष्टम चन्द्र (सावधानी आवश्यक)
शुभ / अनुकूल

ताराबलम्

१५ शुभ / अनुकूल१२ प्रतिकूल
क्षेम (कल्याण)शुभ / अनुकूल
विपत् (विपत्ति)प्रतिकूल
सम्पत् (धन-वैभव)शुभ / अनुकूल
जन्मप्रतिकूल
परम मित्र (अति शुभ)शुभ / अनुकूल
मित्र (हितैषी)शुभ / अनुकूल
निधन (हानि)प्रतिकूल
साधना (सिद्धि)शुभ / अनुकूल
प्रत्यक् (बाधा)प्रतिकूल
क्षेम (कल्याण)शुभ / अनुकूल

पंचक रहित मुहूर्त चक्र

५ शुभ८ अशुभ
०६:०६ पूर्वाह्न – ०७:२६ पूर्वाह्न
शुभ पंचक
०७:२६ पूर्वाह्न – ०९:४० पूर्वाह्न
रोग पंचक (स्वास्थ्य कष्ट)
०९:४० पूर्वाह्न – ११:५६ पूर्वाह्न
मृत्यु पंचक (अत्यंत अशुभ)
११:५६ पूर्वाह्न – ०२:०१ अपराह्न
मृत्यु पंचक (अत्यंत अशुभ)
०२:०१ अपराह्न – ०३:४८ अपराह्न
अग्नि पंचक (अग्नि भय)
०३:४८ अपराह्न – ०५:२१ अपराह्न
शुभ पंचक
०५:२१ अपराह्न – ०६:५२ अपराह्न
राज पंचक (राज्य लाभ)
०६:५२ अपराह्न – ०८:३३ अपराह्न
अग्नि पंचक (अग्नि भय)
०८:३३ अपराह्न – १०:३१ अपराह्न
शुभ पंचक
१०:३१ अपराह्न – १२:४५ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
राज पंचक (राज्य लाभ)
१२:४५ पूर्वाह्न – ०३:०० पूर्वाह्न, अक्टूबर १
चोर पंचक (हानि भय)
०३:०० पूर्वाह्न – ०५:१२ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
रोग पंचक (स्वास्थ्य कष्ट)
०५:१२ पूर्वाह्न – ०६:०६ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
मृत्यु पंचक (अत्यंत अशुभ)
—
—

उदय लग्न समय

12 राशियां
०६:०६ पूर्वाह्न – ०७:२६ पूर्वाह्न
०७:२६ पूर्वाह्न – ०९:४० पूर्वाह्न
०९:४० पूर्वाह्न – ११:५६ पूर्वाह्न
११:५६ पूर्वाह्न – ०२:०१ अपराह्न
०२:०१ अपराह्न – ०३:४८ अपराह्न
०३:४८ अपराह्न – ०५:२१ अपराह्न
०५:२१ अपराह्न – ०६:५२ अपराह्न
०६:५२ अपराह्न – ०८:३३ अपराह्न
०८:३३ अपराह्न – १०:३१ अपराह्न
१०:३१ अपराह्न – १२:४५ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
१२:४५ पूर्वाह्न – ०३:०० पूर्वाह्न, अक्टूबर १
०३:०० पूर्वाह्न – ०५:१२ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
०५:१२ पूर्वाह्न – ०६:०६ पूर्वाह्न, अक्टूबर १
—
—

अन्य कैलेंडर एवं युग गणना

3 क्षेत्र • 9 मान
वैदिक कालक्रम
कलियुग वर्ष
५१२८
कलि अहर्गण
१८७३२१३
लाहिरी अयनांश
२४.२४३८०५°
खगोलीय गणना
जूलियन दिन
२४६१६७८
संशोधित जूलियन दिन
६१६७८
राता डाई (RD)
७४०२५४
राष्ट्रीय एवं जूलियन तिथियाँ
राष्ट्रीय दिनांक
८ आश्विन, १९४९
निरयण दिनांक
१० भाद्रपद, १९४९
जूलियन दिनांक
१७ सितंबर, २०२७ ई.

पर्व, व्रत एवं अनुष्ठान

५ दैनिक व्रत एवं पर्व

दर्श अमावस्या

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला दर्श अमावस्या का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

दर्श अमावस्या का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

अन्वाधान

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला अन्वाधान का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

अन्वाधान का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

इष्टि

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला इष्टि का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

इष्टि का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

भाद्रपद अमावस्या

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला भाद्रपद अमावस्या का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

भाद्रपद अमावस्या का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

चातुर्मास अवधि

प्रमुख पर्व

वैदिक पंचांग एवं सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला चातुर्मास अवधि का पावन पर्व।

पूज्य देवता
समस्त सनातन देवगण एवं परमेश्वर
धार्मिक महत्व

चातुर्मास अवधि का महत्व: १. सनातन संस्कृति: प्राचीन परंपराओं और मूल्यों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। २. आत्मिक ऊर्जा: शुभ विचारों, सात्विकता और ईश-भक्ति का संचार होता है। ३. सामाजिक सौहार्द: दान, परोपकार और प्रेम-भाव से समाज में शांति स्थापित होती है।

पूजा विधि एवं नियम
  • ✦प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • ✦घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • ✦ईष्टदेव को ताजे पुष्प, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • ✦पवित्र स्तोत्रों, चालीसा अथवा वैदिक शांति मंत्रों का पाठ करें।
  • ✦आरती के उपरांत सभी में प्रेमपूर्वक प्रसाद वितरित करें।

पञ्चाङ्ग के पाँच अंग एवं दैनिक पञ्चाङ्ग

5 अंग
पञ्चाङ्ग वैदिक काल-गणना की प्राचीन प्रणाली है, जो सूर्य एवं चन्द्रमा की गति पर आधारित सूक्ष्म खगोलीय सिद्धांतों को प्रस्तुत करती है। 'दैनिक' का अर्थ प्रतिदिन का पञ्चाङ्ग है।

तिथि

1

सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२° के कोणीय अंतर को तिथि कहते हैं। यह व्रत, पर्व और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्धारण का मुख्य आधार है।

नक्षत्र

2

चन्द्रमा जिस २७ नक्षत्र मंडलों (१३° २०' प्रत्येक) में भ्रमण करता है, वह नक्षत्र कहलाता है। यह मानसिक प्रकृति और दैनिक ऊर्जा को प्रभावित करता है।

योग

3

सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग २७ भागों में विभाजित होता है, जिसे योग कहते हैं। यह दिन के वातावरण और अंतःकरण की शुद्धि का सूचक है।

करण

4

एक तिथि के आधे भाग (६°) को करण कहते हैं। यह विशिष्ट कार्यों और मुहूर्तों के सूक्ष्म चयन हेतु उपयोगी है।

वार

5

सात ग्रहों के आधिपत्य वाला वार (दिन), जो स्थानीय सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के २४ घंटों के चक्र को नियंत्रित करता है।