मां चंद्रघंटा की पूजा विधि मुहूर्त और कथा

शारदीय नवरात्र 2026 का तीसरा दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से मां चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों के सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
नवरात्र के तीसरे दिन किस देवी की पूजा होती है?
नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां का यह स्वरूप बहुत ही शांत, सौम्य और कल्याणकारी माना जाता है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसीलिए इन्हें मां चंद्रघंटा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इनकी आराधना करने से साधक को साहस और निर्भीकता की प्राप्ति होती है।
माँ चंद्रघंटा का शुभ मुहूर्त क्या है?
पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन का शुभ मुहूर्त इस प्रकार है:
- तृतीया तिथि की शुरुआत: 12 अक्टूबर 2026, सोमवार रात 10 बजकर 13 मिनट पर
- तृतीया तिथि का समापन: 13 अक्टूबर 2026 रात 11 बजकर 27 मिनट पर
- अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11 बजकर 44 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक
- अमृत काल: शाम 4 बजकर 14 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 57 मिनट तक
नवरात्र के तीसरे दिन की पूजा विधि क्या है?
मां चंद्रघंटा की पूजा करने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया नीचे दी गई है:
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें और मां दुर्गा व मां चंद्रघंटा का ध्यान करें।
- दीपक प्रज्वलित करके सच्चे मन से व्रत का संकल्प लें।
- माता को लाल और पीले रंग के पुष्प अर्पित करें।
- कुमकुम, अक्षत, धूप, दीप और कपूर से माता की विधिवत पूजा करें।
- पूजा के अंत में फल और मिठाई का भोग लगाएं।
- माता के बीज मंत्र का जाप करें और दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
- परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर मां की आरती करें।
पूजा का नियम
पूजा के दौरान साफ-सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। माता को भोग अर्पित करते समय शुद्धता और नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
मां चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए कौन सा भोग लगाया जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां चंद्रघंटा को दूध और दुग्ध उत्पादों से बनी चीजें अत्यंत प्रिय हैं। इस दिन माता को मुख्य रूप से खीर का भोग लगाना चाहिए। इसके अलावा केसर, इलायची और मेवों से तैयार मिष्ठान्न का भोग अर्पित करना भी बहुत शुभ माना जाता है।
महिषासुर वध से जुड़ी मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा क्या है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय महिषासुर नामक असुर ने अपने पराक्रम से स्वर्ग लोक पर कब्जा करने का प्रयास किया, जिससे सभी देवता भयभीत हो गए। देवताओं की रक्षा के लिए त्रिदेवों यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। सभी देवी-देवताओं ने माता को अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए, जिनमें भगवान शिव का त्रिशूल, विष्णु जी का चक्र और इंद्रदेव का घंटा शामिल था। इसके बाद माता ने भीषण युद्ध के बाद महिषासुर का संहार करके ब्रह्मांड को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया।
पूजा मंत्र
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
पिंड पर सवार और भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से युक्त मां चंद्रघंटा मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें।
माँ चंद्रघंटा का बीज मंत्र और स्तुति क्या है?
साधना के दौरान मां चंद्रघंटा के बीज मंत्र 'ऐं श्रीं शक्तयै नम:' का जाप करना चाहिए। इसके अलावा उनकी प्रसिद्ध स्तुति का पाठ करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है।
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