दुर्गा पूजा की मूर्ति में मां की आंखें क्यों होती हैं खास? चक्षुदान परंपरा का रहस्य

Thursday, 15 October 2026
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दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की आंखें सबसे आखिर में बनाई जाती हैं और इस विशेष रस्म को चक्षुदान कहा जाता है, जो महालया के दिन निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत मूर्तिकार मिट्टी की मूर्ति में अपनी तूलिका और काजल से माता की आंखें उकेरकर उन्हें जीवंत स्वरूप प्रदान करते हैं।

दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की आंखें सबसे आखिर में क्यों बनाई जाती हैं?

धार्मिक मान्यता के अनुसार मां दुर्गा की मूर्ति का निर्माण पूरा होने के बाद भी उनकी आंखें सबसे अंत में बनाई जाती हैं ताकि प्रतिमा में प्राणों का संचार किया जा सके। मूर्तिकार बांस और भूसे के ढांचे से लेकर मिट्टी की परतें चढ़ाने, वस्त्र पहनाने और आभूषण सजाने तक का सारा काम पहले पूरा करते हैं। जब माता का पूरा स्वरूप तैयार हो जाता है, तब केवल उनकी आंखें बनाने का कार्य शेष रखा जाता है।

चक्षुदान परंपरा क्या है और इसका क्या महत्व है?

चक्षुदान का शाब्दिक अर्थ आंखों को अर्पित करना या दान करना होता है, जो बंगाल की दुर्गा पूजा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गुप्त अनुष्ठान है। इस प्रक्रिया के माध्यम से म्रणमयी यानी मिट्टी की साधारण आकृति को चिनमयी यानी दिव्य चेतना से युक्त स्वरूप में परिवर्तित किया जाता है। इस रस्म के बिना मां दुर्गा की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और पूजा का विधान अधूरा माना जाता है।

मां दुर्गा की मूर्ति में चक्षुदान की रस्म किस दिन और कब निभाई जाती है?

चक्षुदान की यह पवित्र और रहस्यमयी रस्म महालया के पावन दिन पर निभाई जाती है, जो देवी दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन का समय होता है। उत्सव शुरू होने से ठीक पहले मूर्तिकार द्वारा इस विधि को पूरा किया जाता है ताकि पंडालों में स्थापना से पहले मां का रूप पूर्ण हो सके। महालया के दिन इस कलात्मक और आध्यात्मिक प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही माता के पट भक्तों के दर्शन के लिए खोले जाते हैं।

चक्षुदान की परंपरा कौन निभाता है और इसे करने का अधिकार किसे होता है?

यह विशिष्ट परंपरा परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही कला और साधना से जुड़े केवल वरिष्ठ एवं अनुभवी मूर्तिकारों द्वारा ही निभाई जाती है। साधारण कारीगर या कोई अन्य व्यक्ति इस रस्म को नहीं कर सकता है क्योंकि इसमें गहरी एकाग्रता और कला की आवश्यकता होती है। जब वह मां की आंखों में आखिरी रेखा खींचता है, तो उसमें मूर्तिकार की बरसों की तपस्या और श्रद्धा जुड़ी होती है।

मां दुर्गा की मूर्तिकला में उनकी आंखों की बनावट इतनी खास क्यों मानी जाती है?

माता दुर्गा की आंखों की बनावट में करुणा, ममता और शत्रुओं के संहार के लिए रोष व शक्ति का बहुत ही अनूठा सामंजस्य देखने को मिलता है। एक छोटी सी तूलिका कीL रेखा माता के चेहरे के पूरे भाव को बदल देती है, जिससे भक्तों को उनकी नजरों में अपूर्व ऊर्जा का अहसास होता है। जब भक्त पंडाल में मां की इन अलौकिक आंखों से नजर मिलाते हैं, तो उन्हें केवल रंग-रोगन नहीं बल्कि एक जीवंत देवी का साक्षात आभास होता है।

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