अध्याय ८: बुधवार और बृहस्पतिवार व्रत कथा
श्रावण मास में बुधवार और गुरुवार के व्रत के नियम, कथा और फल—जो भगवान बुध, श्रीहरि विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की कृपा से विद्या, बुद्धि और धन की वृद्धि करते हैं।
अध्याय विहंगावलोकन
- अध्याय
- अध्याय ८
- विषय
- बुधवार और बृहस्पतिवार व्रत कथा
- स्रोत
- शिव पुराण, स्कन्द पुराण (सनत्कुमार संहिता)
- वक्ता
- सूत जी (शौनक ऋषियों से)
- मास
- श्रावण मास (पवित्र सावन)
अध्याय ८: सम्पूर्ण पावन कथा
9 अनुच्छेदभगवान शंकर बोले, "हे सनत्कुमार अब मैं तुमसे पाप को हरने वाले बुध तथा बृहस्पति व्रत को बताता हूँ जिन्हें श्रद्धा के साथ करने से प्राणी उत्तम सिद्धि को प्राप्त कर सकता है।"
ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मणों के राज्यासन पर अभिषिक्त किया था। किसी समय चन्द्रमा की दृष्टि बृहस्पति की पत्नी तारा पर पड़ी। तारा रमणीय, रूपलावण्य सम्पन्न स्त्री थी। चन्द्रमा उसके रूपलावण्य पर मोहित हो काम के वश में हो गए। चन्द्रमा ने देवताओं की गुरु पत्नी को जबरदस्ती अपने घर में रख लिया। कुछ काल पश्चात् उससे एक पुत्र पैदा हुआ। पुत्र का नाम बुध रखा गया। बुध विद्वान् रूपवान तथा सर्वगुण सम्पन्न था।
देवगुरु बृहस्पति अपनी पत्नी को खोजते हुए चन्द्रमा के निवास पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपनी पत्नी तारा को देखा। बृहस्पति चन्द्रमा से बोले, "तुमने गुरु-पत्नी के साथ गमन किया है। इस पाप से तुम कैसे बचोगे? इस महापाप की ओर तुम्हारी बुद्धि कैसे प्रवृत्त हो गई? अब तुम चुपचाप मेरी पत्नी को मुझे लौटा दो और तुम इस पाप से बचने के लिए प्रायश्चित्त करो। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो मैं तुम्हारी शिकायत इन्द्र से करूँगा।"
बृहस्पति के कहने पर भी चन्द्रमा उनकी पत्नी को लौटाने को तैयार नहीं हुआ तो देव गुरु ने राजा इन्द्र से चन्द्रमा की शिकायत कर दी कि इसने मेरी पत्नी का अपहरण कर लिया है। हे इन्द्र! आप देवराज हैं। आप चन्द्रमा से कहकर मेरी पत्नी मुझे वापिस दिलवायें। ऐसा न करने पर चन्द्रमा ने जो पाप किया है वह आपको लगेगा क्योंकि राज्य का पाप शास्त्र के अनुसार राजा को ही भोगना पड़ता है।
देवराज इन्द्र ने चन्द्रमा को बुलाया और उसे आज्ञा दी कि तुम देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा को लौटा दो। किसी दूसरे की पत्नी के साथ गमन करने को पाप माना जाता है तथा गुरु पत्नी के साथ गमन करना महापाप है।
देवराज इन्द्र का आदेश पाकर चन्द्रमा गुरु पत्नी तारा को बृहस्पति को लौटाने को तैयार हो गया परन्तु तारा से उत्पन्न अपना पुत्र मैं वापिस नहीं करूँगा। चन्द्रमा की बात सुनकर देवताओं को संशय हो गया कि यह किसका पुत्र है? इस बात की पुष्टि तो तारा ही कर सकती है कि यह किसका पुत्र है? देवताओं ने तारा को बुलाकर पूछा, "हे कल्याणी! तुम सच सच बताओ यह पुत्र किसका है?" लज्जायुक्त होकर तारा ने कहा, "यह बालक चन्द्रमा का औरस तथा बृहस्पति का क्षेत्रज पुत्र है। अब जिसको ठीक समझें उसे इस बालक को सौंप दीजिए।"
तारा की बात सुनकर बालक बुध को चन्द्रमा को सौंप दिया। इससे गुरु बृहस्पति खिन्न हो गये। उन्हें खिन्न देखकर देवों ने दोनों को वर दिया। चन्द्रमा से कहा, "यह तुम्हारा पुत्र है। अब तुम घर जाओ। चन्द्रमा तथा बृहस्पति पुत्र बुध ग्रह होगा। हे आचार्य और भी शुभ वर को ग्रहण करो। जो प्राणी दोनों का मिलकर एक साथ व्रत करेगा, उसे सब सिद्धियों की प्राप्ति होगी।"
भगवान शिव के प्रिय मास श्रावण में जो लोग बुध और गुरुवार के दिन अर्चना करेंगे उनके खजाने भरे रहेंगे तथा उनका क्षय नहीं होगा। नैवेद्य दही भात से दोनों मूर्तियाँ लिखनी चाहिये। जो दोनों मूर्तियों को झूले पर रखकर अर्चन करता है वह दीर्घायु तथा सम्पूर्ण गुणों से युक्त पुत्र प्राप्त करता है। पाकशाला में लिखकर अर्चना करने से पाक वृद्धि और देवागार में लिखकर अर्चना करने से देव की दया होती है। सोने के कमरे में लिखकर अर्चना करने से पत्नी का वियोग कभी नहीं होता। इस प्रकार यथा स्थान पर उसका फल प्राप्त होता है। सात वर्ष तक व्रत करने के पश्चात उसका उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन में पहले रात में जागरण करें। सोने की प्रतिमा का निर्माण कर विधि पूर्वक अर्चन करें। षोड्श उपचार द्वारा अर्चना कर हवन करें। तिल, घी तथा खीर प्रज्ज्वलित अग्नि में देनी चाहिये। चिंचीड़ा तथा पीपल की समिधाओं से हवन करके पूर्णाहुति डालनी चाहिए। इसके बाद मामा भांजे को भोजन कराकर अन्य ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर उन्हें हाथ जोड़कर विदा करने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। इस प्रकार सात वर्ष तक व्रत करने वाला प्राणी सब इच्छाओं को प्राप्त कर लेता है। जो विद्या की कामना करता है उसे विद्या की प्राप्ति होती है, वह वेदों और शास्त्रों का मर्म जान लेता है। उसे बुध ज्ञान एवं गुरु बृहस्पति गुरुता प्रदान करते हैं।
सनत्कुमार ने भगवान शंकर से पूछा, "आपने पहले मामा तथा भांजे को भोजन कराने का विधान बताया है। इसका कारण क्या है? भगवान शंकर ने कहा, "हे सनत्कुमार! पहले समय में मामा और भांजा दोनों दरिद्र थे। एक दिन दोनों भोजन के लिए घूमते-घूमते एक सुन्दर नगर में पहुँच गये। उन्होंने वहाँ प्रत्येक मकान में श्रावण के महीने में प्रत्येक वार का व्रत करते लोगों का देखा परन्तु बुध और बृहस्पति का व्रत करते कहीं नहीं देखा। दोनों मामा भांजे ने बहुत समय तक आपस में विचार किया कि सब जगह सूर्य और अन्य वारों का व्रत तो हो रहा है परन्तु बुध और गुरु का व्रत देखने को कहीं नहीं मिला। अतः हम दोनों बुध और गुरु का व्रत करें तो अच्छा रहेगा क्योंकि अभी तक किसी ने भी इन दोनों वारों का व्रत किया ही नहीं है। यह अनुच्छिष्ट व्रत है। इसे हम करेंगे। लेकिन विधि विधान न जानने के कारण दोनों संशय में पड़ गये। तब रात्रि में उन्हें विधि विधान का स्वप्न में पता चल गया। स्वप्न से ज्ञात विधि द्वारा दोनों ने इस व्रत को किया। व्रत करने से वे धन धान्य से सम्पन्न हो गये। सात वर्ष तक दोनों मामा भांजे व्रत को करते रहे और वे पुत्र- पौत्र, धन-सम्पदा आदि से सम्पन्न हो गये। बुध और गुरु (बृहस्पति) ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन दोनों को वर दिया कि आप लोगों ने हमारे व्रत का सुविचार किया। आज से जो भी इस व्रत को करेगा और मामा भांजे को पहले भोजन करायेगा, वह उत्तम सिद्धियों को प्राप्त करेगा।"