३० अक्टूबर•कृष्ण पक्ष पंचमी
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अध्याय २१: पूर्णमासी व्रत (रक्षाबंधन)

श्रावण पूर्णिमा का परम पावन पर्व—उपाकर्म (यज्ञोपवीत धारण), रक्षाबंधन और नारली पूर्णिमा। दान, स्नान और पितृतर्पण से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

अध्याय विहंगावलोकन

अध्याय
अध्याय २१
विषय
पूर्णमासी व्रत (रक्षाबंधन)
स्रोत
शिव पुराण, स्कन्द पुराण (सनत्कुमार संहिता)
वक्ता
सूत जी (शौनक ऋषियों से)
मास
श्रावण मास (पवित्र सावन)

अध्याय २१: सम्पूर्ण पावन कथा

8 अनुच्छेद

सनत्कुमार ने भगवान शंकर से पूछा, "हे प्रभु! आप अब मुझे पूर्णमासी की विधि बताने की कृपा करें।" भगवान शिवजी बोले, "हे तात! श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को वेदोत्सर्जन उपाकर्म होता है या फिर पौष माह की पूर्णिमा को यह उपाकर्म किया जाता है। उत्सर्जन में पौष माह या माघ माह की प्रतिपदा तिथि या रोहिणी नक्षत्र बताया गया है। दूसरा समय अपनी-अपनी शाखा के अनुसार उत्सर्जन तथा उपाकर्म दोनों एक ही समय करने उत्तम कहे गये हैं।"

इसीलिये श्रावण मास पूर्णिमा के दिन उत्सर्जन उचित है तथा बहृच शाखार्थी उपाकर्म में श्रवण नक्षत्र उचित है। अतः चतुर्दशी, पूर्णमासी या प्रतिपदा तिथि के दिनों में जिस दिन श्रवण नक्षत्र हो, उसी दिन ऋग्वेदियों का उपाकर्म होता है। यजुर्वेदियों का उपाकर्म पूर्णिमा में तथा सामवेदियों का उपाकर्म हस्त नक्षत्र में होता है। उपाकर्म गुरु और शुक्रास्त नक्षत्र में भी हो सकता है। गुरु तथा शुक्रास्त नक्षत्र में पहले उपाकर्म का शुभारम्भ न करें, यह शास्त्रों का कथन है। ग्रहण तथा संक्रांति आदि योग या दुष्ट समय आ जाने पर उपाकर्म दूसरे काल में करें। हस्तयुक्त पंचमी या भाद्रपद पूर्णिमा के दिन अपने-अपने ग्रह सूत्र के अनुसार उत्सर्जन उपाकर्म करें। मलमास में शुद्ध पक्ष में उत्सर्जन उपाकर्म करना चाहिये। यह दोनों उत्सर्जन उपाकर्म नित्य हैं। इनको प्रतिवर्ष नियम से करना पड़ता है। उपाकर्म की समाप्ति पर द्विजातियों के समक्ष उसी सभा में श्रेष्ठ सभादीप समर्पण करना चाहिए। उसे आचार्य या अन्य ब्राह्मण को दे देना चाहिये। प्रथम सोने, चाँदी या ताँबे के पात्र में एक कि.ग्रा. गेहूँ रखकर उसके ऊपर आटे का बना दीया बनाकर रखें। उसमें घी या तेल भरकर तीन बत्तियाँ जलानी चाहिये तथा पान सहित ब्राह्मण को देकर दक्षिणा देनी चाहिये।

ब्राह्मण का पूजन कर यह मंत्र बोलें, "यह श्रेष्ठ सभादीप दक्षिणा तथा पान सहित देवदेवार्थ हेतु भेंट कर रहा हूँ। मेरे सभी मनोरथ पूरे हों तथा पुत्र पौत्र आदि का भविष्य उज्ज्वल हो, यश की वृद्धि हो।" इस प्रकार पाँच वर्ष पश्चात् उद्यापन करना न भूलें। ब्राह्मण को यथाशक्ति दक्षिणा देकर विदा करना चाहिये। उसी रात को श्रावणी कर्म करना चाहिये। उसी के समीप सर्प बलि देनी चाहिये। ये दोनों कार्य अपने-अपने गृह्यसूत्रों को देखकर करने चाहियें। इसी तिथि में भगवान हयग्रीव का अवतार हुआ था। उस दिन हयग्रीव जयन्ती महोत्सव मनाना चाहिये।

श्रावण मास पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र में भगवान हयग्रीव का जन्म हुआ था। उसी समय सम्पूर्ण पापनाशक सामवेद गाया गया था। इसीलिये इस दिन सामवेद को सुनना चाहिये और उसकी पूजा करनी चाहिये। वहाँ अपने बन्धु बान्धवों तथा मित्रों के साथ भोजन करना चाहिए और मनोविनोद के खेल खेलने चाहियें। हयग्रीव की पूजा करनी चाहिये। शुरू में प्रणव भोजन करना चाहिये। उसके बाद 'भगवते' तथा ' धर्माय' कहकर 'चतुर्थ्यन्तर आत्मविशोधन' शब्द की योजना करनी चाहिये। अन्त में "नमः" शब्द का उच्चारण करना चाहिये।

यह अठारह अक्षरों का मंत्र सब सिद्धियों को प्रदान करने वाला तथा वश्य, मोहन आदि प्रयोगों का एक ही साधक मंत्र है। इसका पुरश्चरण, अक्षर संख्या के अनुसार अठारह लाख या अठारह हजार है। परन्तु इस कलियुग में इसका चौगुना करना चाहिये। इस प्रकार करने से भगवान हयग्रीव प्रसन्न होते हैं और सभी कामना पूर्ण कर देते हैं।

इसी दिन रक्षा बन्धन का पर्व मनाया जाता है। यह सब रोगों का नाश करने वाला तथा अशुभों का नाश करने वाला है। हे सनत्कुमार! इसके विषय में मैं तुम्हें पुराना इतिहास सुनाता हूँ। पहले इन्द्राणी ने इन्द्र की जय के लिए इसे किया था। पुराने समय में देव और असुरों में संग्राम छिड़ गया था जो बारह वर्ष तक चला। इन्द्राणी ने उसी समय इन्द्र को थका जानकर कहा, "हे देव! आज चतुर्दशी है। कल सुबह मैं रक्षा बन्धन करूँगी। जिसके करने से आप अजेय हो जायेंगे। इतना कहकर इन्द्राणी ने पूर्णिमा के दिन मंगल आदि कर, हर्ष देनेवाली रक्षा को इन्द्र के दाहिने हाथ में बाँध दिया।"

इन्द्र ने रक्षा बंधवाकर ब्राह्मणों के साथ स्वस्तिवाचन किया और इसके बाद असुर सेना पर आक्रमण कर दिया। देखते ही देखते इन्द्र ने बलशाली असरों पर विजय प्राप्त कर ली। भगवान भोलेनाथ बोले, "हे सनत्कुमार! श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनुष्य को प्रातःकाल श्रुति-स्मृति विधान द्वारा स्नान करना चाहिये। संध्या, जप आदि करके पितर, देवता और ऋषि तर्पण करना चाहिए। सोने के पात्र की सुरक्षा बनाकर उसको स्वर्ण के सूत्र से बांधकर मोती आदि द्वारा विभूषित, स्वच्छ रेशम के बने, विचित्र ग्रन्थियुक्त, पत्र गुच्छों से सुशोभित, सरसों चावलों को अन्दर रखकर आकर्षक बनाना चाहिए। वहाँ कलश रखकर उसके ऊपर पूर्णपात्र में रक्षा रखनी चाहिये। सुन्दर आसन पर सगे-सम्बन्धियों सहित बैठकर मंगल गान करना चाहिये। इसके बाद "येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वां बध्नामि रक्षे माचलः माचलः ॥" मंत्र का उच्चारण करना चाहिये।"

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य व्यक्तियों को भी पहले ब्राह्मणों की पूजा करके रक्षा बंधन करना चाहिये। इस प्रकार जो रक्षा बंधन करता है वह सब दोषों से छूट जाता है। परन्तु रक्षा बंधन का कार्य भद्रा नक्षत्र में कदापि नहीं करना चाहिये। भद्रा नक्षत्र में इसको करने से विपरीत फल प्राप्त होता है।

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये अध्याय २१ सम्पूर्णम् ॥

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