३० अक्टूबर•कृष्ण पक्ष पंचमी
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अध्याय १३: श्रावण शुक्ल चतुर्थी व्रत

श्रावण शुक्ल चतुर्थी का दुर्गा गणपति व्रत: पाँच पत्रों से गणेश जी की स्वर्ण प्रतिमा का पूजन, प्रार्थना और मन्त्र, तथा उद्यापन।

अध्याय विहंगावलोकन

अध्याय
अध्याय १३
विषय
श्रावण शुक्ल चतुर्थी व्रत
स्रोत
शिव पुराण, स्कन्द पुराण (सनत्कुमार संहिता)
वक्ता
सूत जी (शौनक ऋषियों से)
मास
श्रावण मास (पवित्र सावन)

अध्याय १३: सम्पूर्ण पावन कथा

8 अनुच्छेद

भगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, "अब तुम्हें श्रावण शुक्ल चतुर्थी को किये जाने वाले व्रत "दुर्गा गणपति व्रत" के बारे में बताता हूँ। त्रैलोक्य में प्रसिद्ध इस व्रत को भगवती पार्वती ने श्रद्धापूर्वक किया था। इस व्रत को सरस्वती, इन्द्र, विष्णु, कुबेर, अन्य देवता, मुनि, गंधर्व, किन्नर आदि कर चुके हैं।"

यह व्रत सब प्रकार के पापों को नष्ट करने के लिए किया जाता है। श्रावण शुक्ल चतुर्थी के दिन एकदंत वाले गणेशजी की सोने की मूर्ति बनवाकर सोने के सिंहासन पर स्वर्ण की दूर्वा बिछाकर ताँबे के कलश पर स्थापित करनी चाहिये। लाल कपड़ा बिछाकर सर्वतोभद्र मंडप का निर्माण कर उसपर कलश स्थापित करें। लाल फूल तथा पाँच पत्रों- अपामार्ग, शमी, दूर्वा, तुलसीदल, विल्वपत्र, इस मौसम में होने वाले सुगंधित पुष्पों तथा फलों आदि का नैवेद्य रखकर सोलह उपचार से गणेशजी की पूजा करके प्रार्थना करनी चाहिए, "इस स्वर्ण निर्मित प्रतिमा में विघ्न विनाशक गणेशजी का आवाहन करता हूँ। इसमें वे पधारें। रत्नों से जड़ित उत्तम स्वर्ण सिंहासन बैठने के लिए देता हूँ। आप इसे स्वीकार करें।"

हे पार्वती पुत्र! हे विश्वव्यापिन! हे सनातन! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मेरे विघ्नों का नाश करें। हे सुरश्रेष्ठ! लाल चन्दनचर्चित मैंने भक्तिपूर्वक वन अक्षतों को चढ़ाया है। आप इसे स्वीकार करें। लोकों के अनुग्रह के लिए तथा दानवों के विनाश हेतु एकदन्त। यह आपका पतवार है। प्रसन्नतापूर्वक धूप को स्वीकार करें। इस दीपक को मैं आपको देता हूँ। आपको नमस्कार करता हूँ।

"गणनांत्वा" वैदिक मंत्र से लड्डू तथा खीर, कपूर तथा इलायची युक्त पान आपको समर्पित कर रहा हूँ। हे गणेश्वर! हे गणाध्यक्ष! हे गजानन! हे गौरी पुत्र! मेरा व्रत आपके प्रसाद से परिपूर्ण हो। जो प्राणी पाँच वर्ष तक व्रत कर उद्यापन करता है वह अपने मनवांछित पदार्थों तथा वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है और अन्त में देह त्यागकर मेरे लोक को प्राप्त करता है। यदि इस व्रत को कोई तीन वर्ष तक करे तो उसे सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं और अन्त में मेरे लोक में जाता है।

इस उत्तम व्रत को जो प्राणी उद्यापन के बिना करता है तो यथा विधि पूरा व्रत करने पर भी उसका व्रत निष्फल हो जाता है। उद्यापन अवश्य करना चाहिए। उद्यापन के दिन तिलों को जल में मिलाकर स्नान करना चाहिये। फिर गणेश जी की एक पल या आधा पल या चौथाई पल की स्वर्ण की प्रतिमा बनवाकर उसको पंचगव्य द्वारा स्नान कराकर दूर्वा से पूजा करनी चाहिये। निम्नलिखित मंत्र द्वारा पूजन करना चाहिये -

"हे गणाधीश! उमासुत! विघ्ननाशक! आपको नमस्कार है। हे विनायक! हे ईशपुत्र! हे सर्वसिद्धि प्रदायक! हे हेमवक्त्र! हे मूषकवाहन! हे कुमारगुरो! आपको नमस्कार है।"

उपरोक्त सभी नामों से अलग-अलग पूजन करना चाहिये। पहले दिन अधिवासन करना चाहिए। दूसरे दिन प्रातःकाल हवन करना चाहिए। ग्रहहोम कर, दूर्वा तथा लड्डू से प्रधान होम करना चाहिए। दूब तथा लड्डू के प्रधान होम के बाद पूर्णाहुति करके आचार्य आदि ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार अधिक दूध देनेवाली गाय बछड़े सहित दान करनी चाहिए। ऐसा व्रत करने से मनुष्य अपनी सभी कामनाओं को पूरी कर सकता है।

मैं अपने प्रिय पुत्र के व्रत करनेवाले को सभी सुख प्रदान करता हूँ। अन्त में सद्गति प्रदान करता हूँ।

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये अध्याय १३ सम्पूर्णम् ॥

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