महत्व एवं आध्यात्मिक रहस्य
आध्यात्मिक महत्व, दार्शनिक भाव एवं सनातन मूल्य
संकष्टी चतुर्थी (संकटहरा चतुर्थी) प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। यह पावन व्रत प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश को समर्पित है। इस दिन श्रद्धालु दिन भर उपवास रखकर जीवन के समस्त कष्टों और विघ्नों के निवारण हेतु प्रार्थना करते हैं। संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्र दर्शन और चंद्रदेव को अर्घ्य देने का विशेष विधान है। रात्रि में चंद्रोदय होने पर जल, कच्चा दूध और अक्षत से अर्घ्य देकर गणेश जी की आरती के उपरांत पारण किया जाता है।
जीवन के समस्त संकटों का नाश, आर्थिक व मानसिक बाधाओं का निवारण, बुद्धि, विद्या और परिवार में सुख-समृद्धि की प्राप्ति।
पौराणिक कथा एवं प्रसंग
शास्त्रों एवं इतिहास में वर्णित पावन संदर्भ
“गणेश पुराण के अनुसार जब राजा हरिश्चंद्र और नल-दमयंती घोर संकट में थे, तब उन्होंने संकष्टी चतुर्थी व्रत का पालन कर अपना खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त किया था।”
प्रमुख विधि एवं अनुष्ठान
स्टेप-बाय-स्टेप पूजा विधि एवं आचरण
- १चरण १
सूर्योदय से उपवास का संकल्प धारण करना
- २चरण २
भगवान गणेश को २१ दूर्वा दल, लाल सिंदूर और मोदक अर्पित करना
- ३चरण ३
श्री गणपति अथर्वशीर्ष और संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ
- ४चरण ४
सायंकाल स्थानीय चंद्रोदय के समय की प्रतीक्षा करना
- ५चरण ५
चंद्रदेव को जल, दूध और अक्षत से अर्घ्य देना
- ६चरण ६
मोदक और सात्विक प्रसाद से व्रत का पारण करना
प्रधान देवता एवं पवित्र मंत्र
भगवान श्री गणेश (संकटमोचन गणपति) • कल्याणकारी वैदिक एवं पौराणिक मंत्र संग्रह
श्री गणेश महामंत्र
ॐ गं गणपतये नमः ॥
संकटनाशन गणेश स्तोत्र
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् । भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥
पारंपरिक भोग एवं नैवेद्य
शुद्ध भक्ति एवं भाव से अर्पित पावन व्यंजन
