यूपी-बिहार में अष्टमी, नवमी और विजयदशमी पर खोइछा भरने की परंपरा

शारदीय नवरात्र की अष्टमी, नवमी और विजयदशमी के दिन मां दुर्गा का खोइछा भरने की परंपरा मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार में निभाई जाती है। इस विशेष रस्म में सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को अपनी बेटी मानकर उनके आंचल में चावल, हल्दी, सिंदूर और सुहाग की सामग्री अर्पित करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ऐसा करने से पति की लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
खोइछा भरने की परंपरा क्या है और इसका क्या महत्व है?
खोइछा भरने की परंपरा का संबंध बेटी की विदाई और मां दुर्गा के मायके से विदाई से जुड़ा हुआ है। जिस प्रकार मायके से विदा होने वाली बेटी का आंचल फल, चावल और सुहाग की सामग्रियों से भरा जाता है, ठीक उसी तरह नवरात्र के समापन पर मां दुर्गा की गोद भरी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा को खोइछा अर्पित करने से अखंड सौभाग्य और परिवार में समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह लोक-परंपरा उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्रीय संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नवरात्र में मां दुर्गा का खोइछा किस दिन भरा जाता है?
मां दुर्गा का खोइछा शारदीय नवरात्र के अंतिम दिनों में भरा जाता है। यह रस्म मुख्य रूप से निम्नलिखित दिनों में अनुष्ठित की जाती है:
- अष्टमी के दिन
- नवमी के दिन
- विजयदशमी के दिन
मां दुर्गा के खोइछा में कौन-कौन सी सामग्री रखी जाती है?
खोइछा की पोटली में शुभता, समृद्धि और सुहाग का प्रतीक मानी जाने वाली वस्तुओं को रखा जाता है। इसमें निम्नलिखित सामग्रियां शामिल की जाती हैं:
- लाल कपड़ा
- चावल
- दूर्वा
- हल्दी की गांठ
- सिंदूर
- पान के पत्ते
- सुपारी
- नारियल
- कुछ सिक्के
- मिठाई
- सुहाग का सामान
मां दुर्गा का खोइछा कैसे भरा जाता है?
अष्टमी, नवमी या विजयदशमी के दिन मां दुर्गा की मूर्ति के सामने पूजा की यह विधि पूरी की जाती है। इस रस्म को निभाने का सही तरीका नीचे दिया गया है:
- मां दुर्गा की मूर्ति के सामने एक साफ लाल कपड़ा बिछा दें।
- उस कपड़े पर चावल, दूर्वा, हल्दी, मिठाई, फल, 5 पान के पत्ते और 5 सुपारी रखें।
- इसके साथ ही सुहाग की सामग्री और कुछ सिक्के भी रख दें।
- सभी सामग्रियों को रखकर कपड़े की एक पोटली बना लें और इसे श्रद्धापूर्वक माता रानी को अर्पित करें।
- पोटली के पास देसी घी का दीपक जलाएं।
- मां दुर्गा से जीवन में सुख-शांति की कामना करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमा मांगें।
खोइछा भरने की यह रस्म मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार में शारदीय नवरात्र के समापन पर विदाई की वेला में निभाई जाती है, जिसमें सुहागिन महिलाएं शामिल होती हैं।
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