शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन किसकी पूजा की जाती है?

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शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन किसकी पूजा की जाती है?

वैदिक पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना करने का विधान है और माता की कृपा पाने के लिए व्रत भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन सच्चे मन से मां की आराधना करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और हर प्रकार के भय से छुटकारा मिलता है।

शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन किसकी पूजा की जाती है?

शारदीय नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस दिन साधक देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए विधि-विधान से व्रत और पूजन करते हैं।

मां कालरात्रि की पूजा विधि क्या है?

मां कालरात्रि की पूजा करने की पूरी विधि नीचे दी गई है:

  1. इस दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े धारण करें।
  2. मां कालरात्रि की प्रतिमा का अभिषेक करें और वस्त्र पहनाएं।
  3. देवी को कुमकुम, लाल चंदन और फूल अर्पित करें।
  4. देसी घी का दीपक जलाएं।
  5. सच्चे मन से देवी की आरती करें और व्रत कथा का पाठ करें।
  6. मंत्रों का जाप करें और गुड़ की खीर, फल आदि का भोग लगाएं।
  7. देवी से जीवन में सुख-शांत‍ि की प्राप्ति की कामना करें।
  8. अंत में लोगों में प्रसाद वितरण करें और स्वयं भी ग्रहण करें।

मां कालरात्रि का शुभ मुहूर्त क्या है?

सातवें दिन की पूजा के लिए पंचांग के अनुसार ये मुहूर्त निर्धारित किए गए हैं:

  • अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 38 मिनट तक
  • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 59 मिनट से सुबह 05 बजकर 47 मिनट तक
  • अपराह्न (संध्या) पूजा मुहूर्त: दोपहर 03 बजकर 54 मिनट से शाम 06 बजकर 14 मिनट तक

शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से मां कालरात्रि की आराधना करें और उनकी प्रिय चीजों का भोग लगाएं।

मां कालरात्रि को कौन सा भोग प्रिय है?

मां कालरात्रि को गुड़ अत्यंत प्रिय है। सातवें दिन उन्हें गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयों का भोग लगाना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन चीजों का भोग लगाने से देवी प्रसन्न होती हैं।

मां कालरात्रि की कथा क्या है?

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था, जिससे परेशान होकर सभी देवता महादेव के पास पहुंचे। तब शिव जी ने माता पार्वती से शुंभ-निशुंभ का अंत करने के लिए कहा, जिसके बाद माता पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण किया। जब मां दुर्गा रक्तबीज का वध करने आईं, तो उसे यह वरदान प्राप्त था कि उसके खून की एक बूंद जमीन पर गिरने से उसके जैसा दूसरा राक्षस पैदा हो जाएगा। इस समस्या से निपटने के लिए मां दुर्गा ने अपने तेज से मां कालरात्रि का रूप धारण किया। मां कालरात्रि ने रक्तबीज के रक्त को जमीन पर गिरने नहीं दिया और अपने मुख में ले लिया, जिससे उसका संहार हुआ।

मां कालरात्रि के मंत्र क्या हैं?

पूजा के दौरान इन मंत्रों का जाप किया जाता है:

  • बीज मंत्र: क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:।
  • प्रार्थना मंत्र 1: ज्वाला कराल अति उग्रम शेषा सुर सूदनम। त्रिशूलम पातु नो भीते भद्रकाली नमोस्तुते।।
  • प्रार्थना मंत्र 2: ओम देवी कालरात्र्यै नमः।

कालरात्रि जय-जय-महाकाली। काल के मुह से बचाने वाली।

कालरात्रि जय-जय-महाकाली...

यह स्तुति माता कालरात्रि के भक्तों की रक्षा और संकट दूर करती है।

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