जब क्रोध से काला पड़ गया मां का मुख! मां दुर्गा को कैसे मिला काली नाम?

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जब क्रोध से काला पड़ गया मां का मुख! मां दुर्गा को कैसे मिला काली नाम?

मां दुर्गा ने रक्तबीज का वध करने और देवताओं की रक्षा करने के लिए महाकाली का विकराल रूप धारण किया था। युद्ध के दौरान उनके क्रोध और युद्धाग्नि से मुख काला पड़ने तथा प्रलयकारी स्वरूप के कारण उन्हें 'काली' नाम मिला।

माता ने क्यों धारण किया काली का स्वरूप?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि पर रक्तबीज नाम के असुर का आतंक अत्यधिक बढ़ गया, तब देवताओं और मनुष्यों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा था। वह दैत्यराज शुंभ और निशुंभ का मुख्य सेनापति था। रक्तबीज को ऐसा विचित्र वरदान मिला था कि उसके शरीर से रक्त की एक भी बूंद यदि धरती पर गिरेगी, तो उस बूंद से हूबहू उसके जैसा ही दूसरा महाबली रक्तबीज पैदा हो जाएगा। इसी अजेय वरदान के कारण उसका संहार करना असंभव हो गया था और वह लगातार शक्तिशाली बनता जा रहा था।

दुर्गा सप्तशती में रक्तबीज वध की कथा कहां मिलती है?

दुर्गा सप्तशती की कथाओं के अनुसार, असुरों के आतंक से त्रस्त देवताओं के आग्रह पर जब माता दुर्गा ने देवी चंडिका के रूप में रक्तबीज पर प्रहार किया, तो उसके घावों से रक्त की सैकड़ों बूंदें पृथ्वी पर गिरने लगीं। देखते ही देखते उन बूंदों से हजारों रक्तबीज पैदा हो गए। देवताओं और माता की सेना ने जब उन पर वार किया, तो उनकी संख्या और भी बढ़ गई। रणभूमि में हजारों से लाखों और लाखों से करोड़ों रक्तबीज खड़े हो गए, जिससे स्थिति बेहद भयावह हो गई थी।

मां काली का रूप इतना भयंकर क्यों माना जाता है?

रक्तबीज के आतंक से उत्पन्न उस विकट स्थिति में माता दुर्गा के क्रोध से घोर अंधकार के समान एक दिव्य और भयंकर शक्ति प्रकट हुई। मां काली का यह स्वरूप प्रलय, काल और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है, जिसे देखकर साक्षात मृत्यु भी भयभीत हो जाए। उनके इसी उग्र, प्रलयकारी स्वरूप और क्रोध की अग्नि से मुख काला पड़ने के कारण उन्हें मां काली या मां कलिका नाम मिला।

मां काली ने रक्तबीज का वध कैसे किया था?

रणभूमि में पहुंचते ही मां कालरात्रि ने देवी चंडिका से कहा कि वे रक्तबीज पर अपने अस्त्रों से प्रहार करें और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही वे ग्रहण कर लेंगी।

  • देवी चंडिका ने रक्तबीज पर अपने अस्त्रों से प्रहार करना शुरू किया।
  • जैसे ही असुर के शरीर से रक्त की धाराएं निकलीं, मां कालरात्रि ने अपनी विशाल जीभ से रक्त की बूंदों को चाट लिया।
  • मां ने रक्त ग्रहण करने वाले पात्र यानी खप्पर की सहायता से रक्त को धरती पर गिरने से पूरी तरह रोक दिया।
  • इस रणनीति से धीरे-धीरे रक्तबीज सहित चण्ड और मुंड का वध हुआ और माता काली तथा मां दुर्गा ने तीनों लोकों को भयमुक्त किया।

भगवान शिव को शांत करने की कथा क्या है?

रक्तबीज और अन्य असुरों के संहार के बाद माता काली का क्रोध इतना विकराल हो गया था कि उस क्रोध की ज्वाला से सम्पूर्ण सृष्टि जलने लगी। उस भयंकर प्रकोप को शांत करने के लिए भगवान शिव पृथ्वी पर लेट गए। जब माता काली का पैर शिव जी के ऊपर पड़ा, तब उन्हें यह एहसास हुआ और उनका भयंकर क्रोध शांत हो गया, जिससे उनकी जिह्वा बाहर निकल आई।

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