३० ऑक्टोबर•कृष्ण पक्ष पंचमी
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अध्याय २०: त्रयोदशी व चतुर्दशी व्रत

The worship of Kamadeva on the bright trayodashi with its offerings and betel, and the pavitra-ropana for Shiva on chaturdashi when it could not be done on ashtami.

अध्याय विहंगावलोकन

अध्याय
अध्याय २०
विषय
त्रयोदशी व चतुर्दशी व्रत
स्रोत
शिव पुराण, स्कंद पुराण (सनत्कुमार संहिता)
वक्ता
सूतजी (शौनकादी ऋषींना)
महिना
श्रावण मास (पवित्र श्रावण)

अध्याय २०: संपूर्ण पावन कथा

2 परिच्छेद

भगवान शंकर ने कहा, "हे सनत्कुमार! अब मैं तुम्हें श्रावण शुक्ल त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथि के कार्यों के सम्बन्ध में बताऊँगा। श्रावण शुक्ल त्रयोदशी के दिन कामदेव की षोड्श विधि से पूजा की जाती है। अशोक, मालती, मदन, कौसुम्भ, बकुल तथा अन्य मादक पुष्प तथा लाल चावल, पीले चन्दन, सुगन्धित द्रव्य, पौष्टिक जन्य द्रव्यों तथा दूसरे वीर्यवर्धक द्रव्यों का नैवेद्य समर्पण करके मुख रोचक पान देना चाहिये। उस पान में चिकनी सुपारी, कत्था, चूना, जावित्री, जायफल का चूर्ण, लौंग, इलायची, नारियल के बारीक टुकड़े, केशर और कपूर डालनी चाहिये। ऊपर से चाँदी का वर्क लगाना चाहिये। ऐसे पान को शम्बरासुर के शत्रु की प्रीति के लिये देना चाहिये। मोमबत्तियों से आरती कर पुष्पांजलि देनी चाहिये। कामदेव के नामों का उच्चारण कर प्रार्थना करनी चाहिये। आप बसन्त ऋतु के निमित्तमात्र हैं। आपके मनोरंजन के लिए इन्द्र दिन रात तैयार रहते हैं क्योंकि तपस्वियों से अपने स्थान से च्युत होने के डर से इन्द्र आपसे डरा करते हैं। आपको छोड़कर सुदृढ़ मन से भला दूसरा कौन विरोध कर सकता है? आप भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र अनिरुद्ध, सुरप्रभु, मलयांचल संभूत चन्दन तथा अगरु से सुगंधित हैं। संसार को विजय करने में दक्षिण दिशा की मलय वायु आपकी सहायिका है। हे काम मदन! इस संसार में बिरले ही जितेन्द्रिय मिलेंगे जिन्हें आपने वशीभूत न किया हो। हे कामदेव! आप इस पूजा से प्रसन्न हों। श्रावण शुक्ल त्रयोदशी के दिन कामदेव अर्चित हो जाने से प्रवृत्तिमार्ग लंपट जीव को आप अत्यधिक वीर्य तथा पुष्टि देते हैं और निवृत्तिमार्ग में लगे हुये निरत जीव के काम रूपी विकार को हर लेते हैं।"

हे तात! तुम से मैं त्रयोदशी के कार्य कहता हूँ, सुनो मैंने जो तुमको अष्टमी के दिन का पवित्रारोपण बतलाया है, यदि मनुष्य उसे उस दिन न कर पाये तो प्रभु सदाशिव के प्रीत्यर्थ चतुर्दशी के दिन कर लेना चाहिये। देवी तथा विष्णु समान हो पवित्रा का निर्माण करना चाहिये। केवल प्रार्थना तथा नाम भेद की कल्पना करनी चाहिये। विकल्प से यहाँ जो विशिष्ट बात है, उसे मैं अब तुम्हें बता रहा हूँ। ग्यारह, अड़तीस या पचास तार का बराबर की ग्रन्थियों वाला तथा तुल्य मध्य भाग वाला पवित्रा बनाना चाहिये। पवित्रा बारह अंगुल, आठ अंगुल का होना चाहिये। शेष विधि पहले के समान ही है। फल आदि पहले की तरह ही हैं। अन्त में मनुष्य कैलाश को जाता है।

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये अध्याय २० संपूर्णम् ॥

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