३० ऑक्टोबर•कृष्ण पक्ष पंचमी
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अध्याय १९: एकादशी व द्वादशी व्रत

The ekadashi vrata of both halves of Shravana, kept for Lord Shridhara, and the pavitra-ropana of Vishnu on dvadashi: who may do it, the prayers and the release of the pavitra.

अध्याय विहंगावलोकन

अध्याय
अध्याय १९
विषय
एकादशी व द्वादशी व्रत
स्रोत
शिव पुराण, स्कंद पुराण (सनत्कुमार संहिता)
वक्ता
सूतजी (शौनकादी ऋषींना)
महिना
श्रावण मास (पवित्र श्रावण)

अध्याय १९: संपूर्ण पावन कथा

8 परिच्छेद

भगवान शंकर ने ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार से कहा, "हे महामुने! श्रावण मास के दोनों पक्षों की एकादशी तिथि के दिन क्या करना चाहिए उसे सुनो। एकादशी व्रत के सम्बन्ध में मैंने आज तक किसी को कुछ नहीं बताया है। यह व्रत गुप्त, उत्तम, महान्, पुण्य तथा पाप-ताप को जड़ से नष्ट करने वाला है। श्रावण मास में किये गये पापों का नाश करने वाला तथा सब व्रतों में उत्तम यह पवित्र एकादशी का व्रत है।"

दशमी के दिन प्रातः स्नान कर गुरुदेवों की आज्ञा से वेदवेत्ता, पुराणज्ञाता, जितेन्द्रिय ब्राह्मणों का पूजन करें। भगवान विष्णु का सोलह उपचारों से पूजन करना चाहिये। उनसे प्रार्थना करें, "हे पुण्डरीकाक्ष! मैं दूसरे दिन आने वाली एकादशी का निराहार रहकर व्रत करना चाहता हूँ। आप मेरी रक्षा करें।"

उस दिन गुरुदेव और अग्नि के समीप भूमि पर शयन करना चाहिये। काम, क्रोध और मोह को त्यागकर एकादशी के दिन प्रातःकाल भगवान विष्णु में मन लगाकर श्रीधर का जाप करते रहना चाहिए। तीन दिन तक किसी भी पाखण्डी से वार्त्तालाप न करें। केवल इतना करने मात्र से यह व्रत मोक्ष को प्रदान करने वाला बन जाता है। दोपहर के समय पंचगव्य लेकर नदी के जल में स्नान करना चाहिए। नदी न हो तो कुएँ के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिये। भगवान सूर्य को नमस्कार करके भगवान विष्णु की शरण में जाकर वर्ण के अनुसार सब कार्य करके अपने घर को वापस लौटना चाहिये।

घर आने पर श्रद्धा तथा भक्ति पूर्वक भगवान विष्णु का अर्चन पुष्प, दीप, धूप आदि से करना चाहिये। रात को गीत, वाद्य तथा कथा सुनते हुए जागरण करना चाहिये। फिर कलश स्थापन कर पंचरत्न और स्वर्ण को कलश में डालकर सफेद चन्दन से पूजा कर कलश को दो सफेद कपड़ों से ढक देना चाहिये। देवेश की प्रतिमा शंख, चक्र तथा गदा से युक्त कर उसकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद द्वादशी के दिन प्रातः आह्निक करके "श्रीधर" का जाप करना चाहिये। शंख, चक्र, गदा तथा पद्मधारी भगवान विष्णु की पूजा करके ब्राह्मण को सोने की दक्षिणा सहित कलश देना चाहिये। कलश के साथ मक्खन देना न भूलें।

भगवान श्रीधर! आप प्रसन्न होकर मुझे लक्ष्मी प्रदान करें। इस प्रकार उच्चारण कर श्रेष्ठ वेद पाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें दक्षिणा देकर बिदा करना चाहिये। अपने नौकरों को भोजन कराकर गौ को भूसा देकर स्वयं बन्धु बांधवों सहित भोजन करना चाहिये। इस प्रकार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों तिथियों के व्रतों का विधान एक समान है। शुक्ल पक्ष में श्रीधर और कृष्ण पक्ष में भगवान विष्णु जनार्दन कहे गये हैं।

अब मैं तुम्हें द्वादशी के दिन भगवान विष्णु के निमित्त पवित्रारोपण के सम्बन्ध में बताता हूँ। हे तात! इसका अधिकारी कौन है? यह जान लेना भी आवश्यक है। ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र और स्वधर्म स्थित जनों को भक्ति द्वारा पवित्रारोपण करना चाहिये। स्त्रियों तथा शूद्रों को केवल नाम मात्र द्वारा श्रीहरि का पूजन करना चाहिए। सतयुग में मणि का, त्रेतायुग में स्वर्ण का, द्वापर में रेशमी तथा कलियुग में सूत द्वारा पवित्रा का निर्माण करना चाहिये। सन्यासियों को मानसिक पवित्रारोपण करना चाहिये। पवित्रा को बांस के पात्र में रखकर उसे साफ वस्त्र से ढक कर भगवान श्रीधर के सम्मुख उसे रखकर कहना चाहिये, "हे प्रभु! मैंने अपने क्रियालोपार्थ पवित्रा को ढका है। हे देव! मेरे काम में विघ्न न हो। हे नाथ! आप मुझ पर दया करें। आपको मैं इस पवित्रा द्वारा प्रसन्न करना चाहता हूँ। हे देवेश! आज से लेकर वर्ष भर तक व्रतनाशक काम, क्रोध आदि न हों। आप तब तक मेरी सुरक्षा करें जब तक मेरा व्रत पूर्ण हो।"

कलश पर बांस के पात्र में रखे पवित्रा की नम्रतापूर्वक इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, "हे पवित्रा! एक वर्ष तक किये अर्चन से प्रसन्न होकर आप विष्णु लोक से यहाँ आयी हैं। अतः आपको नमस्कार है। हे देव! विष्णु तेज से उत्पन्न रमणीय तथा पापनाशक, सब इच्छाओं के प्रदाता, आपके शरीर में पवित्रा को धारण करता हूँ। हे देवेश! हे पुराण पुरुषोत्तम! आप मेरे द्वारा आमंत्रित हैं अतः आपका पूजन करता हूँ। आपको नमस्कार है। हे देव! कल प्रातः आपके निमित्त इस पवित्रा को अर्पण करूँगा। इसके बाद पुष्पांजलि देकर रात्रि में जागरण करना चाहिये।"

एकादशी के दिन अधिवासन कर द्वादशी को सुबह पूजा करें। गन्ध, दूब, चावल तथा हाथ में पवित्रा को ग्रहण कर कहें, "हे देवेश! आपको नमस्कार है। इस पवित्रा को आप स्वीकार करें। एक वर्ष तक पुण्य फलप्रद पवित्रा से निवेदन करें- आप मुझे पवित्र करें। हे देव! आपके सुप्रसाद से मेरे से जाने-अनजाने जो पाप हो गये हैं, उन पापों से मैं पवित्र हो जाऊँ। मूल मंत्र द्वारा पवित्रा को सम्पुटित कर नैवेद्य देना चाहिये। मूल मंत्र से अग्नि में घृत तथा पायस द्वारा हवन करना चाहिये। इसी मंत्र द्वारा पवित्रा को विसर्जन करके कहें - हे पवित्रे! एक वर्ष तक किये मेरे अर्चन को सविधि परिपूर्ण करें। हे पवित्रे! विसर्जित हों, विष्णुलोक को लौट जायें। इस प्रकार कहकर उसे ब्राह्मण को दे दें या जल में विसर्जित कर दें। हे वत्स! जो मनुष्य हरि का यह पवित्रारोपण करता है, वह इस संसार में आनन्द भोगकर अन्त में विष्णुलोक को जाता है।"

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये अध्याय १९ संपूर्णम् ॥

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