अध्याय १०: शनिवार व्रत कथा (हनुमान, नृसिंह आणि शनी)
श्रावण शनिवारचे पावन व्रत, ज्यात शनिदेव, नृसिंह आणि हनुमानाची उपासना केली जाते. यामुळे साडेसाती व सर्व ग्रहपीडेचे निवारण होते.
अध्याय विहंगावलोकन
- अध्याय
- अध्याय १०
- विषय
- शनिवार व्रत कथा (हनुमान, नृसिंह आणि शनी)
- स्रोत
- शिव पुराण, स्कंद पुराण (सनत्कुमार संहिता)
- वक्ता
- सूतजी (शौनकादी ऋषींना)
- महिना
- श्रावण मास (पवित्र श्रावण)
अध्याय १०: संपूर्ण पावन कथा
8 परिच्छेदभगवान शंकर ने ब्रह्मा पुत्र सनत्कुमार से कहा, "अब मैं तुम्हें शनिवार व्रत की विधि और माहात्म्य कहूँगा। तुम ध्यान लगाकर सुनो।"
श्रावण मास में शनिवार को तीन देवताओं श्री हनुमान, श्री नृसिंहजी तथा शनि की पूजा की जाती है। प्रथम मैं तुम्हें श्री हनुमान जी को प्रसन्न करने की विधि बताता हूँ। श्रावण महीने के शनिवार को हनुमान जी को खुश रखने के लिए अभिषेक तिलों के तेलों द्वारा रुद्र मंत्रों से करें। तेल मिश्रित सिंदूर उनके शरीर में लगायें। जपा, अर्क तथा मंदार की माला से पूजा कर नैवेद्य के लिए उड़द का बड़ा (पकौड़ा) तथा उपचारों द्वारा पूजन करें। हनुमान जी के प्रीत्यर्थ बारह नामों का - जाप करें। उनके बारह नाम इस प्रकार हैं- हनुमान, अंजनीपुत्र, वायुपुत्र, महाबली, रामेष्ट, फाल्गुन सखा, पिंगाक्ष, अमितविक्रम, अवधिक्रमण, सीताशोक विनाशक, लक्ष्मण प्राणवता तथा दशग्रीवदर्पाहा। जो सुबह उठकर इन बारह नामों का जाप करता है उसे कभी कष्ट की अनुभूति नहीं होती। उसको सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है। श्रावण मास में जो हनुमानजी की शनिवार को आराधना करता है उसका शरीर वज्र की भाँति कठोर होकर मजबूत बन जाता है। उसकी बुद्धि तीव्र हो जाती है। उसके शत्रु निस्तेज हो जाते हैं। मित्रों की संख्या भी बढ़ जाती है। हनुमान जी के मंदिर में बैठकर जो व्यक्ति हनुमान कवच का एक लाख पाठ करता है, वह अणिमा आदि सिद्धियों का साधक हो जाता है। उसके दर्शन मात्र से यक्ष, राक्षस और बेताल आदि उसके सामने नहीं ठहर पाते।
अब मैं तुम्हें भगवान नृसिंह की कथा व पूजन विधि बताता हूँ। दीवार पर या स्तम्भ पर नृसिंह जी का चित्र बनाकर लक्ष्मी जी सहित हल्दी सहित चन्दन, नीले या पीले फूलों द्वारा पूजन करना चाहिए। खिचड़ी और हाथीचक्क की सब्जी के नैवेद्य का भोग लगाना चाहिए। प्रसाद ग्रहण कर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। इसके बाद भगवान नृसिंह को तिल के तेल या शुद्ध घी से स्नान कराना चाहिए। शनिवार के दिन स्वयं सपरिवार शरीर में तेल लगाकर नहाना चाहिए। उड़द की दाल की खिचड़ी बनानी चाहिए। इससे भगवान नृसिंह खुश हो जाते हैं।
इस प्रकार श्रावण मास के समस्त शनिवार को व्रत रखें। इस व्रत से लक्ष्मी का निवास घर में हर समय रहता है। धन धान्य की वृद्धि होती है। प्राणी इस संसार में हर तरह का सुख भोग कर बैकुण्ठ को जाता है। भगवान नृसिंह के वरदान तथा प्रसाद से उसकी चारों ओर कीर्ति फैलती है।
अब मैं तुम्हें शनिदेव के व्रत की कथा एवं उसका महात्म्य बताता हूँ। श्रावण के समस्त शनिवार को शनि का व्रत करें। किसी लंगड़े ब्राह्मण या उसके न मिलने पर किसी अन्य ब्राह्मण को तिल का तेल लगाकर गरम पानी से स्नान करायें। इसके बाद नृसिंह व्रत में बताये अनुसार अन्न से उसे भोजन कराना चाहिए। शनि के प्रीत्यर्थ तेल, लोहा, तिल, उड़द तथा काला कम्बल दान करें। अब मैं शनिदेव के रूप-रंग का वर्णन करता हूँ। शनिदेव का श्याम वर्ण है। गति मन्द है, कश्यप गोत्र है। शनि का जन्म सौराष्ट्र में हुआ है। ये सूर्य नारायण के पुत्र हैं। ये इन्द्रनीलमणि तुल्य हैं। इन्होंने बाण, धनुष तथा त्रिशूल धारण कर रखा है। इनकी सवारी गिद्ध है। इनके यम अधिदेवता हैं। इनको कस्तूरी, अगर, चन्दन तथा गुग्गल और नैवेद्य में उड़द की खिचड़ी प्रिय हैं।
शनि की पूजा में इनकी लोहे की प्रतिमा रखी जाती है। दान देने के लिए श्याम वर्ण का ब्राह्मण उत्तम है। ब्राह्मण को दो काले कपड़े तथा काले रंग की गाय, बछड़े सहित दान में देनी चाहिये और उसकी स्तुति करनी चाहिये।
एक बार राजा नल का राज्य छिन जाने पर राजा नल ने शनिदेव की आराधना की थी। शनिदेव ने उन पर कृपा की और खोया राज्य वापिस प्राप्त हो गया। मनुष्य को चाहिए कि वह इस प्रकार शनिदेव की आराधना कर कहे कि मेरे ऊपर शनिदेव प्रसन्न हों। नीलान्जन के समान कांतिमान, अतिमन्द भ्रामी, छाया नाम वाली स्त्री से सूर्य द्वारा उत्पन्न शनिदेव को मैं हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ। मंडल कोण में स्थित पिंगल नामक शनिदेव को प्रणाम करता हूँ। हे शनिदेव! मुझ अति दीन पर कृपा करो। इस प्रकार बार-बार उनकी स्तुति करनी चाहिए। शनिदेव की आराधना में "शन्नो देवी" मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
जो प्राणी सावधान होकर विधि विधान से शनिदेव की पूजा करता है उसे स्वप्न में भी किसी प्रकार का भय नहीं रहता। शनि जन्म राशि से पहले, दूसरे, चौथे, पाँचवें, सातवें, आठवें, नवें या बारहवें स्थान में हो तो सदा पीड़ा पहुँचाता है। इसीलिये उसकी शांति के लिए "शामाग्नि" मंत्र का जाप करना चाहिए और इन्द्रनीलमणि का दान करना चाहिए।