# तृतीयोऽध्यायः: नक्तव्रतम्

> तृतीयोऽध्यायः - नक्तव्रतम्. Lord Shiva describes the great merit of Nakta Vrat (taking food only once after sunset or star rise during Shravana). He details the procedure, rituals, and the immense spiritual benefits of keeping this austere vow.

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## अध्यायपरिचयः

अध्यायः

तृतीयोऽध्यायः

विषयः

नक्तव्रतम्

मूलम्

शिवपुराणं, स्कन्दपुराणम् (सनत्कुमारसंहिता)

वक्ता

सूतः (शौनकादिमुनिभ्यः)

मासः

श्रावणमासः

## तृतीयोऽध्यायः: सम्पूर्णा कथा

12 अनुच्छेदाः

सनत्कुमार भगवान शंकर से बोले, "आपने व्रत समुदाय का उद्देश्य बताया परन्तु मेरी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई है। आप विस्तारपूर्वक इन व्रतों को बताने की कृपा करें। आप खोलकर मुझे समझायें जिसे सुनकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँ।"

सनत्कुमार की प्रार्थना पर भगवान महादेव बोले, "जो भक्त श्रावण मास को "नक्त व्रत" कर व्यतीत करता है वह सम्पूर्ण वर्ष इस नक्त व्रत का फल भोगता रहता है।" दिन की समाप्ति से तीन घड़ी पहले रात्रि भोजन को "नक्त व्रत" कहा जाता है। नक्त व्रत भोजन में सूर्यास्त से तीन घंटे पहले के समय को छोड़कर शेष समय लिया जाता है। सूर्यास्त से पहले के तीन घंटों को संध्याकाल कहा जाता है। संध्याकाल में आहार, मैथुन, निद्रा तथा स्वाध्याय करना वर्जित है।

अब मैं तुम्हें गृहस्थ एवं संन्यासी के भेद से नक्त भोजन की दो प्रकार की व्यवस्था बताता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। जब सूर्यदेव के मन्द होने पर अपने शरीर की छाया दुगुनी हो जाए, उस समय को संन्यासी के लिए नक्त भोजन व्रत कहा है। शास्त्रों में गृहस्थ के लिए नक्षत्र के उदय होने पर रात्रि भोजन करने को नक्त भोजन व्रत कहा है। शास्त्रों में संन्यासियों के लिए रात्रि काल में भोजन निषिद्ध हो जाने से दिन के अष्ट्म भाग में भोजन करना बताया है। गृहस्थी को विधि द्वारा रात्रि में नक्त व्रत का भोजन करना चाहिए। संन्यासी, विधवा तथा विधुर को सूर्यास्त से पहले ही भोजन करने का विधान है। पुत्रवान, आश्रयहीन तथा स्त्री विहीन पुत्रवान विधुर को रात्रि में भोजन करना निषिद्ध है। श्रावण मास में नक्त व्रत करने वाले प्राणी उत्तम गति को प्राप्त होते हैं।

श्रावण मास के प्रारम्भ होने पर प्रतिपदा तिथि में प्रातःकाल मनुष्य यह प्रतिज्ञा करे कि मैं पूरे श्रावण मास में ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा तथा प्रतिदिन प्रातः स्नान करूँगा। नक्त व्रत, रात्रि शयन तथा अन्य प्राणियों पर दया भाव रखूँगा। वह यह भी संकल्प करे कि यदि मैं इस व्रत के प्रारम्भ होने के बाद और इस व्रत के समाप्ति से पूर्व मर जाऊँ तो हे भगवान! उस स्थिति में आपके प्रसाद से मेरा व्रत परिपूर्ण हो जाये। नक्त व्रत करता हुआ प्राणी मुझे अति प्रिय हो जाता है। ब्राह्मण द्वारा या स्वयं रुद्र का एक मास तक जो अभिषेक करता है, उसपर मेरी सदैव कृपा दृष्टि रहती है क्योंकि मुझे जलधारा अति प्रिय है। श्रावण मास में जो प्राणी अधिक स्वादिष्ट भोजन या उपयोगी वस्तु ब्राह्मण को देता है वह मुझे बहुत प्रिय है।

हे सनत्कुमार! अब मुझसे उत्तम "लक्ष पूजा" विधि को ध्यानपूर्वक सुनो। लक्ष्मी की इच्छा प्राप्ति वाला मनुष्य विल्व पत्रों से, शान्ति की कामना करनेवाला मनुष्य दूर्वाओं से तथा आयु की इच्छा वाला मनुष्य चम्पा के फूलों से भगवान श्री हरि की पूजा-अर्चना करे।

विद्या की इच्छा रखनेवाला व्यक्ति मल्लिका तथा चमेली के फूलों से पूजा-अर्चना करे। तुलसी दल से भगवान श्री हरि और मैं स्वयं प्रसन्न होते हैं। पुत्र की कामना रखनेवाला व्यक्ति कटेरी के फूलों से पूजा अर्चना करे। जिसे बुरे-बुरे स्वप्न दिखाई देते हों, वह उनके नाश के लिए उत्तम धान्य से पूजा अर्चना करे। देव के सम्मुख रंगबल्ली, पद्म, स्वास्तिक और चक्र आदि बनाकर भगवान विभु की पूजा अर्चना करे। सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए सब पुष्पों से मनुष्य को पूजा अर्चना करनी चाहिए। लक्ष्मी पूजा करने से मैं (भगवान शिव) सदा प्रसन्न रहता हूँ। अन्त में उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन के लिए मंडप बनवाकर उसके तीसरे भाग में वेदी बनानी चाहिए। पुण्याह वाचन कर आचार्य का वरण करना चाहिये। मंडप में बैठकर रात्रि जागरण कर वेद पाठ कराना चाहिये। वेदी पर उत्तम चतुर्लिंगतोभद्र बनाकर उसके मध्य भाग में चावलों से सुन्दर कैलाश का निर्माण करना चाहिए। उस वेदी में यथास्थान ताँबे का कलश स्थापित करना चाहिए। उसमें पंचपल्लव तथा सूक्ष्म वस्त्र रखने चाहिए। उसमें भगवान शंकर की स्वर्ण की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराकर स्थापित कर अर्चना करें। नैवेद्य युक्त धूप, दीप, गीत, वाद्य, नृत्य तथा वेदशास्त्र, पुराण द्वारा रात में जागरण करना चाहिए तथा प्रातःकाल होने पर स्नान करना चाहिए।

पवित्र शास्त्रोक्त विधान से वेदी बनानी चाहिए। तिल, घी, पायस, मूलमंत्र, गायत्री, शिव सहस्त्रनाम से हवन करना चाहिए। जिस मन्त्र से पूजन किया है उसी मन्त्र से हवन करना चाहिये। खांड, घी, चावल से हवन करना चाहिये। हवन समाप्ति पर पूर्णाहुति देनी चाहिये। प्रातः वस्त्र, अलंकार, आभूषण से आचार्य का अर्चन करना चाहिए। ब्राह्मणों का पूजन कर उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए।

जिन मंत्रों से भगवान शिव की "लक्षपूजा" की है, उन चीजों को दान करना होता है। स्वर्ण निर्मित भगवान शंकर की मूर्ति का अर्चन करें। यदि एक महीने तक दीप जलाया हो तो उसको दान में देना चाहिये। सम्पूर्ण इच्छाओं की सिद्धि हेतु स्वर्ण की बत्ती, चाँदी का निर्मित दीप बनवाकर उसमें गौ का घी भरकर दान देना चाहिये। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें। इस प्रकार जो मेरी अर्चना करता है मैं उसपर सदैव प्रसन्न रहता हूँ।

जो मनुष्य श्रावण मास में अपनी प्यारी वस्तु का त्याग करता है और वह मुझे अर्पण की जाती है तो हे मुने! उस फल को सुनो। इस लोक में तथा परलोक में वह वस्तु लाख गुणा होकर मिलती है। निष्काम भाव से त्यागने पर उत्तम गति की प्राप्ति होती है। जो भक्त मेरा रुद्री पाठ करता है वह प्रति अक्षर करोड़ वर्ष तक रुद्रलोक में निवास करता है। पंचामृत के अभिषेक से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्रावण मास में धरती पर सोने वाले मनुष्य को हाथी दाँत से बनी हुई या चन्दन निर्मित, नवरत्न से जड़ी हुई, मृदु, गरुड़ चिह्न वाली, रुई से भरी कपड़े के रिजाई और तकियों से सम्पन्न शय्या प्राप्त होती है। वह शय्या उसे सुन्दर स्त्री, अन्न, रत्नों से विभूषित मिलती है।

श्रावण मास में जो आदमी ब्रह्मचर्य का पालन करता है उसका वीर्य अत्यधिक पुष्ट हो जाता है। तेजस्विता, बल, शरीर, दृढ़ता और धर्म कार्य में समस्त उपकारी चीजें उसे मिल जाती हैं।

जो आदमी इस मास में मौन व्रत धारण करता है वह श्रेष्ठ वक्ता हो जाता है। मौन व्रत दिन-रात, दिन या रात या भोजन के समय रखा जा सकता है। मौन व्रत में यदि मनुष्य घंटा तथा पुस्तकें दान करता है तो उसको सब शास्त्रों की जानकारी स्वयं प्राप्त हो जाती है। वह मौन व्रत के प्रभाव से बृहस्पति के समान बुद्धिवाला बन जाता है। मौन व्रत करने वाले मनुष्य की किसी से कलह नहीं होती।

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये तृतीयोऽध्यायः सम्पूर्णम् ॥

## श्रावणमासस्य अन्यानि व्रतानि पर्वाणि च

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