# अध्याय २४: श्रीकृष्ण अवतार व राजा महासेन कथा

> अध्याय २४ - श्रीकृष्ण अवतार व राजा महासेन कथा. The legendary tale of King Mahasena, who attained liberation and earthly sovereignty through the devotion of Janmashtami and deep faith in Lord Krishna and Lord Shiva.

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## अध्याय विहंगावलोकन

अध्याय

अध्याय २४

विषय

श्रीकृष्ण अवतार व राजा महासेन कथा

स्रोत

शिव पुराण, स्कंद पुराण (सनत्कुमार संहिता)

वक्ता

सूतजी (शौनकादी ऋषींना)

महिना

श्रावण मास (पवित्र श्रावण)

## अध्याय २४: संपूर्ण पावन कथा

7 परिच्छेद

भगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, "हे महर्षि! पूर्व कल्प में दैत्यों के अत्याचारों से पीड़ित होकर पृथ्वी ब्रह्माजी के पास गई। पृथ्वी की व्यथा कथा सुनकर पृथ्वी के उद्धार के लिए ब्रह्माजी देवताओं के साथ पृथ्वी को लेकर क्षीरसागर में विष्णु जी के पास गये। ब्रह्माजी के मुख से पृथ्वी की कथा सुनकर भगवान श्रीहरि ने कहा, "आप लोग डरो नहीं। मैं शीघ्र ही देवकी के गर्भ से अवतार लूँगा और पृथ्वी से असुरों का विनाश कर पृथ्वी के कष्टों को दूर करूँगा। आप देवतागण पृथ्वी पर गोकुल में जाकर यादव कुल में जन्म लें।"

भगवान श्री कृष्ण के जन्म लेने पर कंस के अत्याचारों के डर से वासुदेव उनको गोकुल में नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आए। वहाँ पर उनका लालन-पालन बड़े चाव से किया गया। जब भगवान श्री कृष्ण कुछ बड़े हुए तो उन्होंने कंस तथा उसके गणों का मथुरा आकर वध कर डाला और अपने माता-पिता देवकी वासुदेव को कंस की जेल से छुड़ाया। मथुरा वासियों ने भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना की, "हे शरणागत वत्सल! आपको हम नमस्कार करते हैं। हमारी रक्षा करो। हे देव! किसी को भी आपके जन्मदिन का ज्ञान नहीं है। आपके जन्म दिन का ज्ञान होने पर हम उस दिन 'वर्द्धापनोत्सव' मनाना चाहते हैं।"

भगवान श्री कृष्ण ने उनकी भक्ति, श्रद्धा तथा आत्मीयता देखकर उनसे जन्मदिवस में होने वाले कार्य को कहा। उन मथुरावासियों ने भगवान कृष्ण का कथन सुनकर उसी विधान से व्रत किया। भगवान ने उन लोगों को अनेक वर प्रदान किये।

हे सनत्कुमार! इस सम्बन्ध में मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ। अंग देश में मित्रजित नाम का एक राजा था। उसके पुत्र का नाम महासेन था। वह अत्यन्त साधु स्वभाव वाला राजा था। वह प्रजा की अपने प्राणों से भी अधिक रक्षा करता था। प्रजा भी उस पर अपने प्राण छिड़कती थी।

परन्तु वह अचानक पाखंडियों के सम्पर्क में आ गया। जो राजा अपनी प्रजा को प्राणों से अधिक चाहता था वही अब अधर्म के रास्ते पर चल पड़ा। वह वेद, शास्त्र तथा पुराणों की निन्दा करने लगा और वर्णाश्रम धर्म से द्वेष रखने लगा। हे तात! इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर उसकी मृत्यु हो गई। यमदूत उसे पाश में बाँधकर यम के पास ले गये। यम ने उसे नरक में गिराकर बहुत समय तक यातना पहुँचाई। नरक की यातना भोगकर वह पिशाच योनि में गया। भूख प्यास से व्याकुल वह इधर-उधर घूमता हुआ मारवाड़ में पहुँचा तथा एक वैश्य के शरीर में प्रवेश कर गया। वह वैश्य के साथ मथुरा नगरी में पहुँच गया। मथुरा के रक्षकों ने उसे वैश्य के शरीर से अलग कर दिया।

वहाँ पर वह वनों तथा ऋषियों के आश्रमों में घूमता हुआ भगवान की कृपा से जन्माष्टमी के दिन ऋषियों तथा ब्राह्मणों द्वारा की जाने वाली महापूजा में शामिल हो गया। वह वहाँ रात भर जागता रहा और हरि कीर्तन का आनन्द लेता रहा। वह भगवान की कृपा से उसी क्षण निष्पाप, पवित्र और स्वच्छ चरित्र का होकर प्रेत शरीर को छोड़कर विमान द्वारा विष्णुलोक में पहुँच गया। इस व्रत के प्रभाव से वह मोक्ष को प्राप्त हुआ।

यह व्रत सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से मनुष्य को सब अभिष्ट प्राप्त हो जाते हैं। विद्वानों का कर्त्तव्य है कि वे श्री कृष्ण जन्म का विधान लिखकर इसका प्रचार, प्रसार करें।

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये अध्याय २४ संपूर्णम् ॥

## श्रावण महिन्यातील इतर मुख्य व्रते आणि सण

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