# अध्याय ९: शुक्रवार व्रत कथा

> अध्याय ९ - शुक्रवार व्रत कथा. The Friday vrata of the goddess Jivantika, told through Queen Sukeshi, the priest's son Priyavrata, a pilgrimage to Gaya and the talk of the goddesses Shashthi and Jivantika, which shows how the vrata protects a mother's child.

Source: https://www.hinducalendar.today/hi/panchang/lunar-month/shravana/shravana-mahatmya/shravana-mahatmya-chapter-9

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## अध्याय विहंगावलोकन

अध्याय

अध्याय ९

विषय

शुक्रवार व्रत कथा

स्रोत

शिव पुराण, स्कन्द पुराण (सनत्कुमार संहिता)

वक्ता

सूत जी (शौनक ऋषियों से)

मास

श्रावण मास (पवित्र सावन)

## अध्याय ९: सम्पूर्ण पावन कथा

17 अनुच्छेद

भगवान शंकर ने सनत्कुमार से कहा अब मैं तुम्हें शुक्रवार की कथा कहता हूँ जिसे सुनकर प्राणी समस्त विपत्तियों से छूट जाता है। पांडव वंश में एक राजा था जिसका नाम सुशील था। उसके यहाँ कोई सन्तान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम सुकेशी था। पुत्र न होने के कारण वह उदास रहने लगी। रानी स्त्री स्वभाव के कारण हर महीने कपड़ों को अपने पेट पर बाँधकर पेट की वृद्धि करती रही। इस प्रकार साहस के कारण, स्व प्रसूति के अनुसार सुकेशी किसी गर्भवती स्त्री को खोजती रही। संयोगवश उसने गर्भवती पुरोहित की पत्नी को देखा। कपटी रानी ने प्रसव के समय में दाई का कार्य करने वाली अन्य किसी स्त्री को इस काम के लिये नियुक्त किया। उस दाई को एकान्त में बहुत सा धन दिया और अपने गर्भ के अनुकरण की सब बातें कह सुनाई। पुरोहित की पत्नी का प्रसव का समय नजदीक आया। यह सुन उसी तरह दाई ने भी अपने वचन का पालन किया। पुरोहित की पत्नी दाई की बात नहीं जानती थी। अतः वह दाई की बातों का पालन करती थी। दाई ने पुरोहित की स्त्री के नेत्रों पर पट्टी बाँध दी और उसके उत्पन्न हुए पुत्र को रानी के पास भेज दिया। इस प्रकार रानी के पास उस पुरोहितानी के पुत्र के पहुँच जाने की किसी को कानो-कान खबर न हुई। इस नाटक को कोई न जान सका। रानी ने अपनी दासियों द्वारा राजा को खबर करा दी कि उनके यहाँ लड़का पैदा हुआ है। उधर दाई ने पुरोहितानी के नेत्रों से पट्टी खोल दी। वह अपने साथ मांस की एक पिण्डी लाई थी। दाई ने पुरोहितानी को वह मांस की पिण्डी दिखाते हुए कहा, "यह अनिष्ट हुआ है। अपने पति से इसकी शान्ति करवाना। पुत्र नहीं हुआ तो न सही तुम्हारे प्राण तो बच गये।"

पुरोहित की स्त्री सोचने लगी- कही दाई ने मेरे साथ कपट तो नहीं किया?

राजा ने जब पुत्र उत्पन्न होने की बात सुनी तो जातकर्म आदि करके ब्राह्मणों को गज, अश्व, रथ आदि दान में दिये। जो बन्दी बन्दीखाने में बन्द थे सबको छोड़ दिया। राजा ने उसका नाम प्रियव्रत रखा।

श्रावण मास प्रारम्भ होने पर पुरोहित की स्त्री ने शुक्रवार के दिन भक्ति द्वारा "जीवन्तिका" की पूजा अर्चना की। दीवार पर बहुत से लड़कों के सहित जीवन्तिका की तस्वीर बनाई। और पाँच दीपक जलाकर पुष्प माला से पूजा अर्चना की। गेहूँ के आटे के दीपक बनाकर जलाती और स्वयं भी गेहूं के आटे को शुद्ध घी में पकाकर भोजन करती। भोजन के पश्चात् जीवन्तिका से प्रार्थना करती जहाँ पर भी मेरा पुत्र हो, उसे सुरक्षित रखना। इस प्रकार प्रार्थना करने के पश्चात् वह कथा सुनती और यथा विधि नमस्कार करती।

जीवन्तिका के प्रसाद से वह बालक राजा के यहाँ चाँद की तरह बढ़ने लगा और जीवन्तिका उसकी रात-दिन रक्षा करने लगी। कुछ समय बाद राजा का स्वर्गवास हो गया। पितृभक्त पुत्र ने पिता की पारलौकिक क्रिया सम्पन्न कराई। इसके बाद मंत्रिमंडल ने उसको राजसिंहासन पर बैठा दिया। उसने कुछ काल तक राज्य का शासन भली-भाँति किया। इसके बाद वह राज्य का भार मंत्रियों को सौंप कर पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए "गयाजी" को रवाना हो गया। उसने यह यात्रा कार्पटिक वेष में की। रास्ते में वह किसी गृहस्थी के घर पर ठहरा। उस गृहस्थी के यहाँ पुत्र हुआ था। इससे पहले के पाँच पुत्रों को षष्ठी देवी ने मार डाला था परन्तु इस बालक को षष्टी देवी नहीं मार सकी। राजा के वहाँ रहने के कारण जीवन्तिका देवी उसकी रक्षा कर रही थी। गृहस्थ ने जब अपने लड़के को जीवित अवस्था में देखा तो उसको पक्का विश्वास हो गया कि यह बालक अतिथि (राजा) के कारण ही जीवित है। उसने राजा से एक दिन घर पर ठहरने की कृपा की क्योंकि आपकी कृपा से ही मेरा यह छठा पुत्र जीवित है।

गृहस्थ के प्रार्थना पर राजा एक दिन के लिए उनके यहाँ रुक गया। फिर वह गयाजी चला गया और वहाँ पिण्ड देने लगा। पिण्ड देते समय उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने देखा कि पिण्ड को ग्रहण करने के लिए दो हाथ बाहर निकले हैं। एक विद्वान ब्राह्मण से उसने पूछा यह सब क्या मामला है? ब्राह्मण बोला, ये दोनों हाथ तुम्हारे पिता के हैं। घर जाकर अपनी माता से पूछना कि ऐसा क्यों हुआ? तुम्हारी माता ही बतायेगी।

लौटते समय राजा फिर उसी गृहस्थी के यहाँ ठहरा। उसके यहाँ अब दूसरा पुत्र पैदा हुआ था जो केवल सात दिन का था। इस लड़के को लेने जब षष्ठी देवी आई तो जीवन्तिका देवी ने उसे बालक को नहीं ले जाने दिया। षष्ठी देवी ने जीवन्तिका देवी से पूछा आप इन लड़कों को क्यों बचा रही हैं? इसकी माँ ने कौन सा व्रत किया है जो दिन रात आप इसकी रक्षा करती है?

राजा भी उस समय जाग रहा था। वह दोनों देवियों की बात सुन रहा था। वह नींद का बहाना करके पड़ा रहा। जीवन्तिका बोली, "इनके यहाँ जो अतिथि ठहरा हुआ है उसकी माँ श्रावण के महीने में शुक्रवार के दिन मेरा पूजन तथा व्रत नियमानुसार करती है। वह नियम क्या है और किस प्रकार किया जाता है वह सब तुम्हें बताती हूँ।"

इसकी (राजा) माँ उस दिन हरे रंग के वस्त्र और हरे रंग की चूड़ियाँ नहीं पहनती। चावल के धोवन (मांड) को कभी नहीं लाँघती। हरे पत्तों के मंडप के नीचे नहीं जाती। हरे रंग की साग-सब्जी नहीं खाती। यह सब कुछ वह मेरे लिए ही करती है। इसीलिये मैं उसकी तथा उसके पुत्र की रक्षा करती हूँ।

षष्ठी देवी और जीवन्तिका देवी का वार्त्तालाप सुनकर राजा सुबह उठकर अपने राज्य में आया। राजा ने अपनी माता से पूछा, "हे माता! आप जीवन्तिका का व्रत करती हैं तो उसकी विधि क्या है? राजा की माता ने उत्तर दिया, "मैं जीवन्तिका का व्रत नहीं करती इसीलिये मुझे उसकी विधि का ज्ञान नहीं है।" यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और सोचने लगा कि मेरी माता कौन है?

राजा ने गया यात्रा के फल प्राप्त्यर्थ ब्राह्मणों तथा सुहागिनियों को भोजन कराने की इच्छा प्रकट कर उनके यहाँ हरे वस्त्र, हरी चूड़ियाँ आदि परीक्षार्थ भिजवाये। दूत ने सबके यहाँ संदेशा दिया कि आप सब राजा के यहाँ भोजन करने आएँ।

पुरोहित की पत्नी ने राजदूत से कहा, "मैं हरे रंग की कोई चीज नहीं लेती। राजा को यह समाचार मिलने पर उसने पुरोहित पत्नी के लिए लाल रंग के वस्त्र और लाल रंग की चूड़ियाँ भेजीं। पुरोहित पत्नी ने उन चीजों को ले लिया और राजमहल में आई।"

पुरोहित पत्नी को देखकर राजा ने हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया और नियम का पालन करने का कारण पूछा। उसने इसका कारण शुक्रवार व्रत बताया। राजा को देखकर उसी समय उसके स्तनों से मातृ प्रेम के भाव के कारण दूध निकलने लगा। उस दुग्ध से राजा भली प्रकार सिंचित हो गया।

गया में दो हाथ निकलने से तथा रास्ते में गृहस्थी के यहाँ देवी से बातचीत और स्तनों से - दूध निकलने से राजा को पक्का विश्वास हो गया कि यही उसकी माता है।

राजा ने पूछा, "हे माते! भय मत करो और मुझे मेरे जन्म का सही-सही हाल बताओ। सुकेशिनी ने उसके जन्म के सब तथ्य बता दिये। राजा ने प्रसन्न होकर अपना जन्म देने वाले माता-पिता को नमस्कार किया और उनको सम्पत्ति देकर उनका मान बढ़ाया।"

एक दिन रात को राजा ने जीवन्तिका से प्रार्थना की, "हे देवी! मेरे जन्मदाता पिता तो मौजूद हैं, फिर गया में पानी से दो हाथ किसके निकले थे?" देवी ने राजा को ख्वाब में ही उत्तर दिया, "हे राजन्! मैंने तुम्हें विश्वास दिलाने हेतु ऐसी माया रची थी, इसमें तुम कोई सन्देह न करो।"

भगवान शंकर बोले, "हे सनत्कुमार! मैंने तुम्हें शुक्रवार के व्रत करने का माहात्म्य कह सुनाया। इस व्रत को श्रावण के मास में करने से मनुष्य की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।"

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्रावणमाहात्म्ये अध्याय ९ सम्पूर्णम् ॥

## श्रावण मास के अन्य मुख्य व्रत एवं त्यौहार

[श्रावण मास (विस्तृत विवरण) →](https://www.hinducalendar.today/hi/panchang/lunar-month/shravana/shravana-month)[शिव सोमवार व्रत कथा →](https://www.hinducalendar.today/hi/vrat-katha/weekdays/somavara/shiva-somavara-vrat-katha)[सावन शिवरात्रि मुहूर्त →](https://www.hinducalendar.today/hi/festivals/sawan/sawan-shivaratri-date-time)[मंगला गौरी व्रत कथा →](https://www.hinducalendar.today/hi/vrat-katha/mangala-gauri/mangala-gauri-vrat-katha)[नाग पंचमी पूजन विधि →](https://www.hinducalendar.today/hi/festivals/nag-panchami/nag-panchami-date-time)[रक्षाबंधन मुहूर्त →](https://www.hinducalendar.today/hi/festivals/rakhi/info/rakhi)
